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शुक्रवार, 3 नवंबर 2017

गुरु पर्व / प्रकाश पर्व/ गुरु नानक जयंती

गुरु पर्व / प्रकाश पर्व/ गुरु नानक जयंती 
सत श्री अकाल :: ਸਤਿ ਸ੍ਰੀ ਅਕਾਲ

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          पंचांग के अनुसार गुरु नानक देव जी की जयंती कार्तिक मास की  पूर्णिमा को मनायी जाती है (कार्तिक महीने का अंतिम दिन ) जबकि अंग्रेज़ी कैलेंडर के अनुसार उनका जन्म  15 अप्रैल 1469 को हुआ था। सिख धर्म के संस्थापक प्रथम गुरु बचपन से ही अध्यात्म की ओर मुड़ गए थे।  उन्होंने बिना संन्यास धारण किये ही ईश्वरीय मार्ग को चुना और स्थापित किया कि मन की पवित्रता ही सत्य और ईश्वर के निकट ले जाती है। 

          गुरु नानक देव जी  का व्यक्तित्व एवं कृतित्व एक समाज सुधारक , दार्शनिक , कवि ,पथ प्रदर्शक , देशप्रेमी और गृहस्थ जीवन में रहकर सद्मार्ग पर चलने वाला, आडम्बरविहीन जीवन जीने वाला सच्चा ईश्वर का सेवक  का है जो उन्हें देव तुल्य बनाता है। धार्मिक कट्टरता और रूढ़ियों से परे उन्होंने समाज में शांति और पवित्रता की स्थापना के लिए अपना समूचा जीवन होम दिया। आज भारत से लेकर विश्वभर में सिख धर्म की चर्चा है जोकि विश्वबंधुत्व का विराट विचार सम्प्रेषित करता है।  समाज में प्रेम और सद्भाव को बढ़ावा देता है।  सिख धर्म सनातन धर्म से निकली सुंदर ,चमत्कृत ,पवित्र शाखा है जोकि अपना स्वतंत्र अस्तित्व रखती है जिस पर भारतीय संस्कृति गर्वोन्नत है।

           सिख धर्म में पवित्र ग्रंथ "गुरु ग्रंथ साहिब" की पूजा की जाती है जिसमें गुरुओं की पवित्र वाणी का संग्रह है। आज से दो दिन पूर्व गुरुद्वारों और घरों में गुरु ग्रंथ साहिब का अखंड पाठ आरम्भ हो जाता है और एक सप्ताह पूर्व ( गुरु नानक जयंती के दिन से ) प्रभात फेरी निकलना आरम्भ हो जाती है। आज प्रकाश पर्व के दिन उत्सव का माहौल होता है।  आज के दिन "निशान साहिब" और "पंच प्यारों" की झांकी निकलती है बड़ी धूमधाम के साथ , ढोल नगाड़े ,बैंड बाज़ों के साथ, नगर कीर्तन के साथ । तलवारबाज़ी के करतब भी दिखाए जाते हैं। 
सिख धर्म के दशवें गुरु  गुरु गोविन्द सिंह जी ने खालसा पंथ की स्थापना की जिसमें सिख धर्म की विधिवत दीक्षा लेना और अमृत चखना आदि का प्राधान्य है। दीक्षा ( नाम लेना / गुरु मन्त्र  ) लेने वाले को केश ,कंघा ,कड़ा ,कृपाण और कछेरा (कछा ) धारण करना अनिवार्य माना  जाता है। 
              गुरु नानक साहिब जी के उपदेश जीवन को सफल बनाए जाने को प्रेरित करते हैं।  परिवार ,समाज, देश और दुनिया में प्रेम और भाईचारे को बढ़ावा देने वाले उनके विचार सदैव नई रौशनी बिखेरते रहेंगे।
विश्वभर में आज प्रकाश पर्व की धूम दिखाई देती है। श्रद्धालु  बढ़-चढ़कर इस उत्सव में भाग लेते हैं। 


मन मूरख अजहूं नहिं समुझत, सिख दै हारयो नीत।

नानक भव-जल-पार परै जो गावै प्रभु के गीत॥

                                     #रवीन्द्र सिंह यादव  

गुरुवार, 2 नवंबर 2017

ग्लोबल वार्मिंग

                     आज विश्व समुदाय को ग्लोबल वार्मिंग जैसे ज्वलंत मुद्दे से परिचित होकर उसके निराकरण के लिए अपना-अपना योगदान तय करने की आवश्यकता है।  निरंतर सामने आ रहे वैज्ञानिक निष्कर्ष हमारी चिताओं को गहरा करते जा रहे हैं। सौरमंडल का एकलौता ग्रह पृथ्वी जिस पर जीवन है उसके अस्तित्व को  मनुष्य की आधुनिक जीवनशैली ने  ख़तरे में दाल दिया है। 

                     ग्लोबल वार्मिंग अर्थात पृथ्वी पर तापमान में वृद्धि। जिसकी मुख्य वजह ग्रीन हाउस गैसें ( कार्बन-डाई-ऑक्साइड, मीथेन, नाइट्रस ऑक्साइड , ओज़ोन और जलवाष्प आदि ) हैं। ये गैसें वातावरण में ऊर्जा प्रवाह ( गर्मी को अवशोषित करना और पुनः उस गर्मी को पृथ्वी पर लौटा देना जिससे धरती का तापमान बढ़ता है ) को प्रभावित करती हैं। 

                    ग्लोबल वार्मिंग के मुख्य कारणों में CO2 के स्तर में बढ़ोत्तरी, जीवाश्म ईंधन का अंधाधुंध प्रयोग, विभिन्न कारणों से धरती पर ताप उत्पन्न करना (कारख़ाने ,उद्योग आदि ), आधुनिक जीवन शैली , प्रदूषण और पेड़-पौधों की निर्मम कटाई आदि ।

वनस्पति और जीवों के बीच प्रकृति ने अनूठा सम्बन्ध स्थापित किया है जिसे मनुष्य ने अपने स्वार्थ में डूबकर धता बताई और आज पृथ्वी के लिए आसन्न ख़तरा विकराल रूप धारण कर चुका है। 

                वनस्पति हमारे द्वारा साँस में ऑक्सीजन ग्रहणकर वापस छोड़ी गयी ज़हरीली कार्बन-डाई-ऑक्साइड गैस को अपने लिए इस्तेमाल करती है और प्राणवायु  ऑक्सीजन हमारे लिए वातावरण में छोड़ती है इस तरह पर्यावरण में संतुलन रहता है।  पर्यावरण में असंतुलन को शहरीकरण , इमारती लकड़ी के शौक़िया प्रयोग , ईंधन में लकड़ी का प्रयोग , वृक्षारोपण के प्रति उदासीनता आदि बढ़ावा दे रहे हैं। 

  हाल ही में दिल्ली शहर में एक कार की बड़ी चर्चा है।  कार की छत पर गमलों में लगे पौधे रखकर चलना एक अनूठा प्रयोग है पर्यावरण के प्रति अपना योगदान देने का, दूसरों की परवाह के प्रति अपनी संवेदना प्रकट करने का।  भले ही लोग इसे हास्यास्पद प्रयोग कहें लेकिन पीछे छिपी गंभीरता पर विचार करने की आवश्यकता है।     

सूर्य से आने वाले हानिकारक विकिरण को रोकने वाली पृथ्वी के ऊपर स्थित ओज़ोन छतरी में भी छेद होने की वजह क्लोरो फ्लोरो कार्बन को माना गया है। पृथ्वी से ऊपर उठने वाली हानिकारक गैसें और प्रदूषण पृथ्वी से कुछ ऊँचाई पर एक प्रकार की धुंध- छतरी का निर्माण कर देते हैं जिससे पृथ्वी की सतह से टकराकर लौटने वाली सूर्य की गर्मी, विकिरण और उत्पन्न हुई गर्मी को यह प्रदूषित छतरी आसमान में पुनः जस का तस लौट जाने से रोककर पृथ्वी के वातावरण में ही लौटा देती है जिससे धरती का तापमान बढ़ता है। 
पृथ्वी का तापमान बढ़ने से अनेक प्राकृतिक आपदाऐं आती हैं। पृथ्वी के ध्रुवों (ग्लेशियरों जहां दिन छह माह का और रात छह माह की , विशालतम बर्फ़ के भंडार ) पर जमी बर्फ़ पिघलकर समुद्र के जलस्तर को बढ़ायेगी और समुद्री किनारों पर बसे शहर तथा अनेक टापू डूबने से नहीं बचेंगे। पृथ्वी का तापमान निरंतर बढ़ते जाने से जीवन की संभावनाओं को भी ख़तरा उत्पन्न हो गया है। 
वैज्ञानिकों का निष्कर्ष ठोस तथ्यों पर आधारित है अतः इस मुद्दे को गंभीरता से समझने की आवश्यकता है। 
आदरणीया श्वेता जी ने ठीक ही कहा है कि यह स्थिति एक व्यक्ति के सोच लेने या प्रयास करने से बदलने वाली नहीं है बल्कि सभी को अपनी-अपनी भूमिका तय करनी चाहिए। 

#रवीन्द्र सिंह यादव 

रविवार, 29 अक्तूबर 2017

देवठानी एकादशी : भारतीय संस्कृति का लोचदार पर्व


   देवशयनी एकादशी से देवठान एकादशी तक.... 

              कल कार्तिक मास की शुक्लपक्षीय देवठानी ग्यारस (एकादशी ) है अर्थात मांगलिक कार्यों  पर लगी वर्जना के समाप्त होने का दिन। शुभ कार्यों में देवों के आह्वान का पुनः आरम्भ। त्यौहारों ने हमारे जीवन को सात्विकता से बांधकर रखा है। जीवन मूल्यों को निखार देते हैं त्यौहार। सद्भाव और सौजन्य का निर्माण करते हैं त्यौहार। लोकदृष्टि और लोकहितकारी सोच का सृजन करते हैं त्यौहार।   

           भारतीय जीवन दर्शन में एक पद्धयति विकसित की गयी जो जीवन को सारगर्भित बनाते हुए सत्य की ओर बढ़ने का मार्ग प्रशस्त करे और समाज में सद्भावना का निरंतर विकास होता रहे। सामाजिक मूल्य सत्य ,प्रेम ,करुणा ,दया ,त्याग ,परमार्थ ,परहित ,अहिंसा ,भक्ति ,सत्कार ,सेवा ,सहनशीलता ,समर्पण ,सहायता ,सुकर्म आदि अनवरत विकसित होकर समाज का उत्थान करते रहें इसी मंतव्य से वैदिक साहित्य में सनातन धर्म से जुड़े आख्यानों की प्रचुरता है।प्राचीन धार्मिक ग्रंथ वेदों (ऋग्वेद ,यजुर्वेद ,सामवेद ,अथर्ववेद ) में वर्णित ज्ञान और गूढ़ रहस्य को सरलीकृत करने के उद्देश्य से पुराणों की रचना ब्राह्मण विद्वानों ने की जिनमें सृष्टि ,देवी-देवताओं से लेकर राजाओं तक के विवरण व वंशावलियाँ मिलती हैं। अर्थात पुराण एक तरह के विस्तार हैं जिनमें कई उल्लेख विवादस्पद भी हैं और अप्रामाणिक भी। 

             भारतीय सामाजिक जीवन में रची-बसी मान्यताओं ,परम्पराओं ने समय-समय पर सार्थक रुप बदले और समाज को उत्कृष्ट आयाम प्रदान किये हैं तथा अपने विराट लचीलेपन ( कर्मकांड, निर्गुण और नास्तिक / साकार-निराकार ) से विश्वभर को प्रभावित किया है इसीलिए भारतीय संस्कृति और सभ्यता की अंतः सलिला सतत बहती आ रही है, दूसरों को अपनी ओर आकर्षित करती आ रही है जिस पर हमें गर्व है। 

             चौमासा (चातुर्मास) भारतीय सामाजिक परिवेश में स्थापित शब्द है जिससे जुड़ी मान्यता मूल्यवान है तभी तो जनमानस ने उसे सहर्ष स्वीकार किया है। भारतीय कैलेंडर चैत मास से आरम्भ होता है जिसका चौथा महीना आषाढ़ है। आषाढ़ अर्थात वर्षा ऋतु का आरम्भ। खरीफ फ़सल की जुताई-बुवाई का समय। वर्षाकाल में नदी-नालों में बाढ़ का समय। फ़सल की देखभाल का समय , भोजन के रखरखाव में विशेष सावधानी बरतने का समय , मनुष्य और पशुओं को प्रभावित करने वाली मौसमी बीमारियों का समय ,शरीर की इम्मूनिटी पावर घट जाने का समय, कीड़े-मकोड़ों , सांप-बिच्छू आदि के बढ़ने और बिलों से बाहर आकर विचरण का समय,प्रकृति के पुनः सजने-संवरने का समय, पेड़-पौधों के बढ़ने और पल्लवित होने का समय, जलाऊ ईंधन के गीले-सीले होने का समय ,घातक बैक्टीरिया ,वायरस और फंगस के अत्यधिक बढ़ने का समय, जड़ी-बूटियां आदि एकत्र करने में कठिनाई का समय , सुहानी ऋतु में प्रकृति की सुकुमारता के अवलोकन और आनंद लेने का समय। साफ़-सफ़ाई बरक़रार रखने में दुश्वारियों का समय, सूर्य के अक्सर बादलों में छुपकर धूप धरती तक न पहुँचा पाने का समय,प्रकृति के प्रकोप का समय ,घर-द्वार-परिवार बचाने का समय, आवागमन के लिए दुर्गमता का समय ......... आदि-आदि। 

                  इसलिए यदि पौराणिक कथाओं में ऐसा कहा गया कि आषाढ़ मास की शुक्लपक्ष एकादशी ( देवशयनी या हरिशयनी एकादशी ) से अगले चार माह अर्थात कार्तिक मास की शुक्लपक्ष एकादशी (देवठान ग्यारस / देवठान एकादशी / प्रबोधिनी एकादशी ) तक देवताओं के अधिपति भगवान विष्णु देवताओं सहित (अग्नि देवता का विशेष महत्त्व ) शयन को चले जाते हैं तो कल्पना कीजिये उन तात्कालिक परिस्थियों में ऐसा कहना ही उपयुक्त रहा होगा क्योंकि इसमें स्वहित न होकर व्यापक सामाजिक हित समाया हुआ है। अपवादों का तो हर जगह बोलबाला रहा है। ईष्ट कभी सोता नहीं है लेकिन सामूहिक रूप से समाज को समझाने का यही तरीका उस वक़्त उपयुक्त रहा होगा। और यदि हम सकारात्मक दृष्टिकोण से सोचें तो आज भी यह विचार बेदम और बेकार नहीं है बस हमें उसके भाव की व्यापकता को आत्मसात करना चाहिए। इन चार महीनों में साधु-संत अक्सर एक ही स्थान पर रूककर धर्म और ज्ञान का प्रचार-प्रसार किया करते थे। 


                   चौमासा में मांगलिक कार्यों ( विवाह, कारोबार आरम्भ करने ,नया निर्माण करने , भोजन सम्बंधी वर्जनाएं आदि ) को वर्जित किये जाने का विचार सनातनी परंपरा में गहराई तक व्याप्त हो गया। पौराणिक कथाओं में एक कथा सतयुगीन राजा मांधाता , ब्रह्मा जी के पुत्र अंगिरा ऋषि और शूद्र की तपस्या से भी जुड़ी हुई मिलती है जोकि तत्कालीन सामाजिक व्यवस्था में वर्ण-व्यवस्था के प्रभाव को रेखांकित करती है। ईश्वर ने हमें बंधनों और भेदभाव के साथ जन्म नहीं दिया बल्कि कालांतर में स्वर्ग-नरक ,पाप-पुण्य के फेर में जीवन को अनेक वर्जनाओं में बांध दिया गया जोकि ज्ञानी जनों का कार्य है कि वे सामाजिक विकृतियों पर गहन चिंतन - मनन करें और धर्म को मानवीयता के पथ पर अनवरत चलते रहने से भटकने न दें।

                "उठो देव", "बैठो देव" का पवित्र उच्चारण और गन्ना पूजन, घंटा-ध्वनि  का सुखमय दृश्य कभी नहीं भूलता ..... सकारात्मक ऊर्जा से भर देती है कल आने वाली तिथि "देवठानी एकादशी"....... सभी को अग्रिम हार्दिक मगंलकामनायें ! 


#रवीन्द्र सिंह यादव 

बुधवार, 11 अक्तूबर 2017

पटाखों से हुई ज़हरीली हवा फेफड़ों में धर्म पूछकर नहीं घुसती

       समाचारों के अनुसार दिल्ली में पिछली साल की तरह स्मोग का सितम  इस बार भी छाने वाला है। विगत  9 अक्टूबर को माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने एक याचिका की सुनवाई करते हुए 31 अक्टूबर  2017 तक दिल्ली-एनसीआर (N C R=NATIONAL CAPITAL REGION)  में पटाखों की बिक्री पर रोक लगाने  का आदेश दिया है। उल्लेखनीय है कि अदालत ने बिक्री पर रोक लगायी है कि पटाखे चलाने पर।  एनसीआर में दिल्ली से सटे प्रदेशों हरियाणा,उत्तर प्रदेश और राजस्थान के कुछ शहर और  क़स्बे (हरियाणा से  गुरुग्राम ,फ़रीदाबाद ,रोहतक,करनाल, झज्जर ,रेवाड़ी ,पलवल ,सोनीपत ,जींद ,दादरी,मानेसर ; उत्तर प्रदेश से नोइडा (NOIDA = NEW OKHLA INDUSTRIAL DEVELOPMENT AUTHORITY ), ग़ाज़ियाबाद,मेरठ,बाग़पत,हापुड़ ,मुज़फ़्फ़रनगर ,बुलंदशहर और राजस्थान से अलवरआते हैं। 

        पीएम 2.5 हवा की तंदुरस्ती का मापक बन गया है। ताज़ा रिपोर्ट के मुताबिक़ पीएम 2.5 (PM= Particulate Matter) हवा में मौजूद अत्यंत हानिकारक महीन कण जोकि सांस  द्वारा सीधे फेंफड़ों तक पहुँच सकते हैं इनकी मात्रा  हाल ही में 5 गुना बढ़ गयी है। पिछली दिवाली पर पटाखों ने इतना प्रदूषण फैलाया था कि उस दिन विश्व में सर्वाधिक प्रदूषित शहरों की सूची में दिल्ली ने अपना नाम अव्वल स्थान पर दर्ज़ करा लिया था और अगले 10 दिन तक प्रदूषण ने लोगों का जीना दुश्वार कर दिया था। 

         आजकल बड़े शहरों में प्रदूषण को मापने के लिए ऑनलाइन इंडिकेटर्स सक्रिय हैं। इनके द्वारा उपलब्ध आंकड़ों से हमें हवा की सेहत का पता चलता है। AQI (AIR QUALITY INDEX )  0-50 सर्वोत्तम है।  51-100 को संतोषजनक माना जाता है।  101 होते ही स्वास्थ्य के लिए हानिकारक स्थिति बन जाती है। सांस के मरीज़ों से लेकर सामान्य व्यक्ति भी इस स्थिति में परेशानी अनुभव करने लगता है।  यह आंकड़ा 300 पार करते ही आपातकाल की स्थिति आ जाती है। ज़रा सोचिये पिछली दिवाली पर पटाखों के कारण हुए प्रदूषण ने इस इंडेक्स को 431 पर पहुँचा दिया था। अतः पटाखों से जुड़ी इस भयावह स्थिति से देश के हरेक नागरिक को अवगत होने की सख़्त ज़रूरत है भले ही अज्ञानतावश लोग इसे नकारते रहें और अपनी ख़ुशी को धार्मिक एंगिल से जोड़कर दूभर होती सांस लेने की कठिनाई को नज़रअंदाज़ करते रहें। 


            हमारी नाक में प्राकृतिक फ़िल्टर होता है जोकि सांस में खींची गयी  हवा  में मिले हुए तमाम  नुकसानदेह कणों को फेंफड़ों तक जाने से रोकता है। लेकिन जब 2.5 माइक्रोन के कण हवा में तय मात्रा से अधिक होंगे तो श्वांस के ज़रिये शरीर में जाकर वे अनेक प्रकार के श्वांस सम्बन्धी रोग उत्पन्न करते हैं। सडकों,वाहनों के परिचालन ,पुरानी गिराई जा रही इमारतों (शहरों में आजकल अल्ट्रा मॉडर्न डिज़ाइन और सुबिधाओं के फ़ेर में मज़बूत इमारतों को भी तोड़कर नया बनाया जा रहा है ), खुदाई,औद्योगिक गतिविधियों (पत्थर खदान,पत्थरों की कटाई-घिसाई,सीमेंट उद्योगआदि से उत्पन्न धूल ,पेट्रोल-डीज़ल,लकड़ी,कोयले,कचरे आदि का धुआँ इत्यादि मिलकर हवा को लगातार अस्वास्थ्यकर बना रहे हैं। 

            इस बार दिल्ली-एनसीआर में दिवाली की रौनक लोगों को  फीकी लग सकती है लेकिन माननीय सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला  सराहनीय है। मुमकिन है लोगों को पटाखों की कर्कश ध्वनि से आंशिक राहत मिले  और सांस लेने में ज़्यादा तकलीफ़ हो।ज़रा सोचिये  पटाखों की तेज़ कर्कश धमक प्रदूषण तो बढ़ाती ही है साथ में दिल के मरीज़ों,धमाकों से डरने वालों (मानसिक रोग की अवस्था, फोबिया), नौनिहालों और पशु-पक्षियों आदि को तो प्रभावित करती ही है साथ में आर्थिक,सामाजिक प्रभाव भी छोड़ती है। 

                 ख़ुशी का मनोविज्ञान भी अजीब है।  हम ख़ुशियाँ बांटकर ज़्यादा प्रसन्न होते हैं। भावातिरेक में ख़ुशी को दूर-दूर तक फैलाने के लिए दूसरों को होने वाली असुबिधा की परवाह को रौंदते हुए अपनी सामाजिक  जवाबदेही  को परे रख चीख़-चिल्लाहट के साथ अनेक आधुनिक यत्न करते हैं जिसके कि अब पार्श्व प्रभाव (SIDE EFFECTS) उभरकर सामने चुके हैं। कुछ लोगों को ख़ुशी हज़म नहीं हो पाती अचानक ब्लड प्रेसर ( रक्त दबाव) बढ़ने से वे दूसरी दुनिया की सैर पर निकल जाते हैं। उद्घोष,शंखनाद ,ढोल-नगाड़ों ,घंटा-ध्वनि ,बैंड-बाजों,संगीत,गायन,प्रसाद वितरण आदि के द्वारा सामान्यतः खुशियाँ बिखेरी जाती थीं लेकिन कालांतर में बारूद के आविष्कार ने ख़ुशी को विस्फोटक आवाज़ से मिलने वाले फ़रेबी सुकून और रोमांच  में उलझा दिया। पटाखे दिवाली उत्सव से कालांतर में जुड़ गये। मुग़लकाल से बारूद हमारी ख़ुशियों के प्रसारण से जुड़ गयी और आज की पीढ़ी बारूदी पटाखों से ख़ुशियाँ मनाते हुए बड़ी हुई है अतः उसे माननीय सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला नागवार गुज़रने वाला है।  हो सकता है कि लोग इस फ़ैसले को नकारात्मक रूप में लें और प्रतिक्रिया स्वरुप ज़्यादा पटाखे चलाने के उपक्रम करें। चंद स्वार्थी लोगों की लाभार्जन की नियत लोगों को मुद्दे से जुड़ी अहमियत से दूर ले जाती है और ऐसे लोग भावनात्मक पहलू उजागर करते हुए अंधश्रद्धा को बढ़ावा देते हैं ताकि उनका अपरोक्ष लक्ष्य पूरा हो सके। 
                
          पटाखों को लेकर हमारा जूनून इस हद तक बढ़ गया है कि सोशल-मीडिया में लोग खुलेआम सुप्रीम कोर्ट के फैसले की आलोचना कर रहे हैं और मुद्दे को सांप्रदायिक रंग देने की ग़लत कोशिश में सीधा धर्म से जोड़ रहे हैं। इन महानुभावों को ज्ञात नहीं कि पटाखों से हुई ज़हरीली हवा फेफड़ों में धर्म पूछकर नहीं घुसती बस अपनी इक-तरफ़ा सोच को जायज़ ठहराने में कुतर्क लेकर समाज को भ्रमित करने के व्यापार में जुट गए हैं अपना स्वार्थ छुपाकर। 

                   आतिशबाज़ी के भव्य आयोजन , धार्मिक ,राजनैतिक जुलूस , चुनावों में जीत ,शादी-समारोह,नव वर्ष से जुड़े आयोजन और कभी-कभी क्रिकेट मैच में देश की टीम की जीत आदि ने पटाखा व्यापार को आधार प्रदान किया है।  कुछ लोगों को रोज़गार भी मिला है लेकिन इस व्यापार ने अनेक ज़िंदगियां तबाह भी कर डाली हैं और कुछ लोगों ने पैसा भी ख़ूब बनाया है।

पटाखों से बम तक के सफ़र में समाज गूंगा-बहरा हो चुका है।  आधुनिकता की आंधी पर्यावरण से जुड़ी समझ को भी उड़ा ले गयी। लोग अपने पड़ोसी  से प्रतिस्पर्धा करते हुए बच्चों के लिए पटाखों का बज़ट लगातार बढ़ाते चले गए।  अब दो बिल्डिंगों ( ऐसी इमारतें जहाँ कई परिवार बसते हैं ) के बीच पटाखे चलाने को लेकर बे-लिहाज़ प्रतियोगिता देखी जा रही है।  वे नहीं जानते कि उनके कृत्य  द्वारा हवा में मिलाया गया ज़हरीला धुआँ कितनी ज़िन्दगियों को तकलीफ़ में डालता है। 

बहरहाल एक आंकड़े पर विचार करते हैं
          लाइव इण्डिया पॉपुलेशन डॉट कॉम के अनुसार आज (11-10 -2017  समय दोपहर 12:32 ) भारत की जनसंख्या का अनुमानित आंकड़ा 1,28,63,46,956 ( एक अरब अट्ठाईस करोड़ त्रेसढ़ लाख छियालीस हज़ार नौ सौ छप्पन है। अब आधी जनसंख्या कम  कर दीजिये ( क्योंकि दक्षिण भारत और उत्तर-पूर्वी राज्यों में दिवाली और पटाखों को लेकर उत्तर भारत जैसा बेतुका  जूनून नहीं देखने को मिलता तथा कुछ धार्मिक कारणों से भी, दिवाली पर पूरे घर को जलते दियों से सजाया जाता है वहां   अब पटाखों का प्रभाव आंशिक तौर पर वहां भी पहुँच गया है ) तो आंकड़ा होगा 64,31,73,478 ( चौसढ़ करोड़ इक्कतीस लाख तेहत्तर हज़ार चार सौ अठहत्तर ) एक परिवार में अमूमन 5 सदस्य होते हैं अर्थात 12,86,34,695 ( बारह करोड़ छियासी लाख चौंतीस हज़ार छह सौ पंचानवेपरिवार दिवाली पटाखों के साथ मनाते होंगे या मनाते हैं जोकि एक अनुमान है।  अब मान लीजिये कि औसतन एक परिवार पटाखों पर 100 रुपये ख़र्च करता है ( कुछ परिवारों का पटाखों का बज़ट 10,000 रुपये से भी ऊपर होता हैतो कुल पटाखों पर बर्बाद हुई रकम होगी लगभग 1300 करोड़ रुपये .......!

       एक तरफ़ हम लगभग 1300 करोड़ रुपये आग के हवाले कर देते हैं सिर्फ़ रोमांचकारी ख़ुशी की ख़ातिर और दूसरी ओर अनेक लोगों का इलाज का बज़ट भी बढ़वा दिया साथ में प्रदूषण को बढ़ाने में अपना योगदान भी झौंक दिया नासमझी में। 
       दिवाली पाँच दिन का त्यौहार है अतः लोग सिर्फ़ एक दिन ही पटाखे नहीं चलाते। पटाखों का दमघोंटू ज़हरीला धुंआ ,कानफोड़ू कर्कश आवाज़ और पटाखों के परख़च्चे उड़ने से पैदा हुआ कचरा सभी पर्यावरण को भारी नुकसान  पहुँचा रहे हैं। आर्थिक बर्बादी के अलावा यह सनक अब ख़ुशी की सीमाएं लांघकर आफ़त बन चुकी है। 
        दीपावली पर पटाखों का शोर शुरू होते ही अस्पतालों में पटाखों से घायल और सांस की तकलीफ़ के साथ लोगों का आना आरम्भ हो जाता है जिनमें अधिकांश अबोध बच्चे और वृद्धजन होते हैं। बिना पटाखों के हमें दिवाली मनाने में थोड़ा असहज लग सकता है लेकिन दूसरों की परवाह करते हुए ,पर्यावरण प्रेमी बनते हुए यदि आप ज़हरीली होती हवा को सांस लेने के लिए और अधिक ज़हरीला बनने में अपना योगदान हटा लेंगे तो आपको जवाबदेह नागरिक होने का एहसास पुरसुकून से भर देगा। 
पटखारहित दिवाली की पेशगी हार्दिक शुभकामनाऐं। 

प्रस्तुत लेख देश के विभिन्न भागों में रहने वाले लोगों से चर्चा के बाद मैंने लिखा है जिसमें शामिल हैं

 1. कुमारी रवनीत कौर  
 2. श्रीमती राखी के.आर
 3. श्रीमती शैली घिल्डियाल   
 4. श्रीमती तरु मारवाह  
 5. श्री प्रवीण कुमार 
 6. श्री क्षितिज कुमार 
 7. श्री विरेश कुमार   
 8. श्री तुषार रोहिल्ला 
 9. कुमारी जोहिता महापात्रा 
10. कुमारी रानी वांगशोल 
11. कुमारी काजल चौधरी 
12. कुमारी सरिता          
13. श्रीमती सूजा       
14. कुमारी प्रीति           
15. श्री मुकुंद राजपूत   
16. श्री राजकुमार प्रसाद 
17.श्री विनोद कुमार शर्मा  
18. मियां मोहम्मद शाहनवाज़ सिद्दीकी 
19. श्री गौरव मिश्रा 
20 . कुमारी हन्नू श्री  

# रवीन्द्र सिंह यादव