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शुक्रवार, 4 अगस्त 2017

#Farmers क्या क़र्ज़ माफ़ी किसानों की समस्या का हल है ?

भारत को कृषि प्रधान देश कहा जाता रहा है। देश की अधिकांश जनसँख्या अपने जीवन यापन के लिए कृषि पर निर्भर है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार भारत की 49 प्रतिशत जनता कृषि क्षेत्र पर निर्भर है।
सन 1950 में देश की जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद ) में कृषि क्षेत्र का योगदान 50 प्रतिशत था जो अब घटकर लगभग 15 प्रतिशत रह गया है। कारण स्पष्ट है कि सरकार ने कृषि क्षेत्र की घोर उपेक्षा कर अन्य क्षेत्रों को भरपूर बढ़ावा दिया। आगे आने वाले 5 वर्षों में कृषि क्षेत्र का जीडीपी में योगदान घटकर 10 प्रतिशत से भी नीचे  चला जाय यह स्वाभाविक है क्योंकि भारत सरकार जिस प्रकार से उद्योगों को बढ़ावा दे रही है उससे कृषि योग्य भूमि के लगातार कम होते जाने की प्रबल संभावनाएं हैं। उद्योगों को उदारतापूर्वक ज़मीन उपलब्ध कराई जा रही है।

थम नहीं रहा है किसानों की आत्महत्याओं का दौर -

आज किसान क़र्ज़ (बैंकों ,महाजनों /साहूकारों )के बोझ से दबा हुआ है ,खेती में नुकसान ,सूखा ,ग़रीबी ,बीमारी ,पारिवारिक समस्या ,बढ़ती महंगाई ,बढ़ते खर्चे ,फ़सल की बर्बादी से व्यथित होकर आत्महत्या जैसे त्याज्य क़दम उठा रहे हैं। यह सिलसिला अब रुकना चाहिए। माननीय सर्वोच्च न्यायलय भी किसानों की आत्महत्याओं पर सुनवाई कर रहा है जहाँ सरकार की ओर  से पेश किये जा रहे किसानों की आत्महत्याओं के आँकड़े गंभीर चिंता का बिषय हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आँकड़े बताते हैं कि किसानों की आत्महत्याओं की दर बढ़ती जा रही है।

मार्च से ही किसान आंदोलन की भूमिका -

वर्तमान में किसानों के आन्दोलन से उपजे हालातों की चर्चा ज़ोरों पर है। देशभर के किसान संगठन अब एक होकर सरकार पर दबाव बना रहे है ताकि किसानों की समस्याओं का स्थायी निदान हो सके। पिछले 14 मार्च से तमिलनाडु के किसानों ने 43 दिन तक दिल्ली के जंतर मंतर पर बैंक क़र्ज़ की माफ़ी से  लेकर किसानों की समस्याओं के समाधान हेतु  विभिन्न तरीकों से आंदोलन किया अंत में उन्होंने अपने तय कार्यक्रम के अनुसार पेशाब पिया तो केंद्र सरकार की निष्ठुरता पर गंभीर सवाल उठे। तब तमिलनाडु की राजनीति सक्रिय हुई और आश्वासन के बाद  23 अप्रैल को किसानों ने आंदोलन स्थगित किया।  इस आंदोलन की रचनात्मकता ने देशवासियों का ध्यान किसानों की समस्याओं की ओर खींचा।

अब ये किसान पुनः जंतर मंतर दिल्ली में अपना आंदोलन 18 जुलाई की किसान रैली से पहले ही  बहाल कर चुके हैं अपनी पुरानी  मांगों को लेकर।

प्रधानमंत्री द्वारा क़र्ज़ माफ़ी की घोषणा -

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों के दौरान प्रधानमंत्री द्वारा घोषणा की गयी कि यदि उनकी पार्टी चुनाव जीतेगी तो उत्तर प्रदेश के किसानों के क़र्ज़ माफ़ किये जाएंगे।  पार्टी को सत्ता मिली और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री द्वारा अनेक किन्तु -परन्तु के साथ राष्ट्रीयकृत बैंकों से लिए गए जून 2016 तक के 1 लाख तक के फ़सली ऋण की माफ़ी की घोषणा कर दी गयी लेकिन इस घोषणा को अभी तक अमली जामा पहनाये जाने के पुख़्ता  इंतज़ाम नहीं हो पाए हैं। यहाँ विवादस्पद मुद्दा बना कि प्रधानमंत्री सिर्फ़ चुनावी राज्य  में किसानों के बैंक ऋण की माफ़ी की घोषणा कैसे कर सकते हैं।

किसानों का दिशाहीन उग्र आंदोलन -

महाराष्ट्र में 1 जून से किसानों ने अपना आंदोलन किसान आयोग के अध्यक्ष रहे डॉक्टर एम  एस  स्वामीनाथन द्वारा सुझाई गयी सिफारिशों को लागू करने और क़र्ज़ माफ़ी की मांग पर शुरू किया।  इस आंदोलन में किसानों ने अपने उत्पाद दूध ,फल,सब्ज़ियां आदि सडकों पर बिखेर दिए और आंदोलन को उग्र बना दिया वहीँ 2 जून से मध्य प्रदेश के मालवा में भी किसानों के उग्र आंदोलन ने सरकारी एवं निजी संपत्ति को भारी नुकसान पहुँचाया।  यहाँ मंदसौर में 6 किसानों की पुलिस की गोली से मौत हो गयी।  मध्य प्रदेश सरकार ने मरने वालों के परिवार को 1 करोड़ रुपये मुआवज़ा और सम्बन्धी को सरकारी नौकरी देने की घोषणा की।

केंद्र सरकार की कठोरता -

इस बीच केंद्र सरकार ने साफ़ कर दिया कि किसानों की क़र्ज़ माफ़ी का मुद्दा राज्य सरकारों का है उसकी ओर से कोई  राहत नहीं दी जाएगी।  बल्कि केंद्र सरकार के एक मंत्री ने तो किसान क़र्ज़ माफ़ी को फ़ैशन तक बता दिया।  ऐसी संवेदनहीनता किसानों के प्रति देश की जनता ने पहली बार देखी - सुनी। जबकि केंद्र सरकार किसानों की आय 5 साल में दो गुनी करने की घोषणा कई बार कर चुकी है लेकिन वास्तविकता यह है कि सरकार ने किसानों को फ़सल  की औसत लागत का डेढ़ गुना दाम देने का अपना चुनावी वादा तक नहीं निभाया जोकि स्वामीनाथन आयोग की एक सिफारिश है। किसानों के हालिया उग्र आंदोलन की एक बजह पिछले साल नबंवर में हुई नोट बदली की घोषणा भी है।

अन्य राज्यों ने भी की क़र्ज़ माफ़ी की घोषणा -

इस आंदोलन के दौरान महाराष्ट्र ,पंजाब ,और कर्नाटक सरकारों ने किसानों के बैंक क़र्ज़ को माफ़ करने की घोषणा विभिन्न शर्तों के साथ कर दी।  अब गुजरात और हरियाणा के किसान भी क़र्ज़ माफ़ी की मांग को तेज़ करने की तैयारी में हैं।

मंदसौर से दिल्ली तक -

इस आंदोलन का महत्वपूर्ण पड़ाव है देशभर के किसान संगठनों का एक मंच पर जाना। देशभर के विभिन्न 200 से अधिक किसान  संगठन अपनी मांगों को लेकर  अब एक साझा आंदोलन की तैयारी कर चुके  हैं।
   6  जुलाई 2017  से  18  जुलाई 2017  तक  मंदसौर से दिल्ली तक ( म. प्र. , महाराष्ट्र , गुजरात ,राजस्थान ,उत्तर प्रदेश ) की यात्रा से एक बार फिर किसान आंदोलन देश में चर्चा का बिषय बन गया ।

कुछ उपाय -

सरकार को स्पष्ट किसान -नीति बनाकर किसानों की समस्याओं का समाधान करना चाहिए न कि किसानों के साथ तरह -तरह के भेदभाव अपनाने चाहिए। न्यूनतम समर्थन मूल्य सरकार द्वारा घोषित किया जाता है फिर भी सरकार किसान की पूरी उपज उस मूल्य पर खरीदने से कतराती है। किसान को उसकी फ़सल का डेढ़ गुना दाम मिले और सरकार किसान द्वारा बेची  जाने वाली उपज को न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीदने से न हिचकिचाए।  किसानों को उन्नत खेती के प्रति आकर्षित करे उन्हें भरोसा दे तब किसानों की आत्महत्याओं का दौर थम सकेगा। किसानों की कमाई हड़पने वाले दलालों को रोका जाय। फसल -बीमा को  अधिक ग्राही ,उपयोगी और सरल बनाया जाय। छोटे किसानों का संरक्षण किया जाय।  किसान -पेंशन भी आरम्भ की जाय। यथोचित स्वास्थ्य सुबिधायें गाँव तक विकसित की जाएँ।


किसान के साथ बड़ी बिडम्बना यह है कि उसका उत्पाद देश की जनता को सस्ते दामों पर मिलता रहे इसलिए उसे अपने उत्पाद की कीमत तय करने का अधिकार नहीं है जबकि उद्योगपति अपने उत्पादों की कीमतें ख़ुद तय करते हैं। किसानों के प्रति सरकार द्वारा सहानुभूतिपूर्वक रचनात्मक क़दम उठाये जाने चाहिए ताकि किसान बार -बार क़र्ज़ के जाल में न फंसे।
#रवीन्द्र सिंह यादव 

गुरुवार, 3 अगस्त 2017

चोटी बचा के रखना ...... अक़्ल खोल के रखना

       चोटी शब्द से हम सभी परिचित हैं। चुटिया ,चुटैया ,शिखा ,शिख  आदि इसके समानार्थक शब्द हैं।  साहित्य में नायक-नायिका के नख-शिख (पाँव के नाख़ून से लेकर मस्तक के शिखर पर बालों का भाग अर्थात शिख तक का अलंकृत करने वाला रसमय वर्णन मिलता है। महिलाओं की चोटी पर कई फ़िल्मी गीत और लोकगीत प्रचलन में हैं। आपने अब तक वोट कटवा ,मुँह नुचवा शब्द सुने और पढ़े होंगे अब एक नया शब्द ख़ौफ़ लेकर आया है "चोटी कटवा " .

        आजकल उत्तर भारत में "महिलाओं की चोटी-चर्चा " प्रिंट व इलेक्ट्रॉनिक मीडिया / सोशल मीडिया / अफ़वाहों के बाज़ारों और शरारती तत्वों की मेहरबानी से उत्पन्न दिलचस्पी से गुलज़ार भी  है, ख़तरे में भी है। दुनिया अपनी सोच को तराशती हुई तर्कसंगत ज्ञान में अपना विश्वास बढ़ा रही है तब भारत में अंधविश्वासों के नए-नए प्रयोग सामने आते रहते हैं।  चोटी कटने से बचाने के लिए धार्मिक उपाय भी सामने आ रहे हैं।  तमाम टोने -टोटके ,तांत्रिक उपाय आदि  सामाजिक ढकोसले अचानक चर्चा में आ गए हैं।  इस अवसर को चालाक लोग भुनाने में जुट गए हैं और कमाई कर रहे हैं जबकि यह मात्र  एक  अफ़वाह है। लोगों को कही -सुनी व्यर्थ की बातों पर यकीन नहीं करना चाहिए।  सरकार द्वारा दी जा रही प्रामाणिक जानकारी और सलाह पर भरोसा करना चाहिए। 

       जुलाई 2017 में राजस्थान के ग्रामीण इलाक़े से  चली महिलाओं की चोटी  काटे जाने की  अफ़वाह अपनी  यात्रा में विस्तार करते हुए उत्तर प्रदेश ,हरियाणा, म. प्र. होते हुए दिल्ली तक पहुँच गयी है।  पुलिस और फोरेंसिक विशेषज्ञ  वास्तविकता का पता लगाने में जुटे हुए हैं इस अंतर्राज्यीय अवांछित समस्या की। लोग दहशत से भरे हुए हैं।
       सूचनायें एकत्र करने वालों को कोई ठोस कारण अभी तक हाथ नहीं लगा है।  लोग अलग-अलग कारण बता रहे हैं।  चोटी काटने वाला कभी पुरुष है ,कभी स्त्री है ,कभी बिल्ली है ,कभी अदृश्य शक्ति /अलौकिक शक्ति या चुड़ैल  (काल्पनिक डरावना पात्र ) है। कुछ लोगों के अनुसार यह शरारती तत्वों का कोई गैंग है। 

         जिस देश में शिक्षा का  स्तर गिराने के सरकारी प्रयास किये जा रहे हों। विश्वविद्यालयों में शिक्षार्थियों के प्रवेश पर अनेकानेक प्रकार के प्रतिबन्ध लगाए जा रहे हों , सीटों की संख्या घटाई जा रही हो ,शिक्षा का बज़ट घटाया जा रहा हो , विद्वानों का मज़ाक़  उड़ाया जाता हो वहाँ संगठित चालाक समूह अपनी कलाबाज़ी दिखाने में कहाँ चूकते हैं।

          मई 2017 में  झारखण्ड राज्य में सोशल मीडिया के ज़रिये  बच्चा चोर गैंग के सक्रिय होने की अफ़वाह फैलाई गयी परिणामस्वरूप  18  लोगों को भीड़ ने पीट -पीटकर मार डाला।
चोटी काटने की अफ़वाहों के चलते आगरा के ग्रामीण इलाक़े में एक बुज़ुर्ग  महिला को  चोटी काटने वाली चुड़ैल समझकर पीट -पीटकर अधमरा कर दिया जिसकी बाद में मौत हो गयी। 

            दरअसल जनता की बौद्धिक गहराई और मानसिक स्वास्थ्य को मापा जा रहा है ऐसे प्रयोगों से।  किसी चुनाव से पहले इन प्रयोगों की मंशा पर विचार अवश्य किया जाना चाहिए। 
पिछले वर्ष उत्तर प्रदेश और दिल्ली में शिल-बट्टा और चाकी को रात में चुपचाप चुड़ैल द्वारा टाँकने की अफ़वाहें  मीडिया में सुर्खियाँ बटोर रहीं थीं। जबकि यह पत्थर कुतरने / काटने वाले एक कीड़े की करतूत थी।  ऐसे भ्रामक समाचार मीडिया की टीआरपी बढ़ा देते हैं। हर किसी की दिलचस्पी बढ़ जाती है यह जानने के लिए कि आगे और क्या-क्या  हुआ तो वह टीवी पर समाचार देखता -सुनता है या अख़बारों में पढ़ता है। 

         भारत में अफ़वाहों अर्थात भ्रमित समाचार फैलाकर अपने निहित स्वार्थ साधना कुछ लोगों का मक़सद रहा है। मुझे बचपन की दो अफ़वाहें याद हैं। एक (जोकि 70 के दशक की है )- जिसमें विवाहित बहन /बहनें अपने  भाई / भाइयों  को उनकी सलामती के लिए मायके में जाकर खीर खिलायें। मैंने देखा था बहनें आयीं -गयीं थीं भाइयों को खीर खिलाने अपने-अपने  मायके में।  अनावश्यक रूप से करोड़ों बहनों की मेहनत की कमाई किराये -भाड़े ,चावल ,चीनी ,दूध ,मेवे आदि में ख़र्च हुई और बेचने वालों ने नफ़ा कमाया।  फिर भी भाइयों की मौतें होती रहीं जैसे पहले होती थीं।  
दूसरी (जोकि 80 के दशक की है ) - माँ अपने हर बेटे के नाम से 10 गुलगुले (आटा ,चीनी या गुड़ से बने मीठे पुए / पकोड़े ) खाये ताकि बेटों  पर से  मौत का ख़तरा टल जाय। यहाँ भी तेल,गुड़ और चीनी को संगठित धूर्तता ने महंगा बिकवा दिया था लेकिन लोग अपनी  मौत मरते रहे। 

       90 के दशक के आरम्भ में तोरई के पत्ते पर नाग-नागिन की आकृति का जन-भ्रम  इतनी प्रचण्डता पा गया कि इसकी चर्चा संसद तक में हुई।  कृषि -वैज्ञानिकों ने दख़ल देकर स्पष्ट किया कि पत्ते पर किसी कीड़े के चलने से सर्पाकार आकृति बन रही है। यह कोई अलौकिक घटना या चमत्कार नहीं है। पूरे बरसाती मौसम में अधिकांश लोगों ने तोरई की सब्ज़ी का स्वाद नहीं चखा।  तोरई बाज़ार में उपलब्ध होती थी लेकिन ख़रीदार न होने से कीमत बहुत सस्ती थी। 

         21 सितम्बर 1995 में गणेश जी की मूर्ति के दूध पीने की अफ़वाह संगठित तौर पर फैलाई गयी।  भौतिकशास्त्रियों ने हस्तक्षेप करते हुए स्पष्ट किया कि यह मात्र अफ़वाह है पृष्ठ तनाव ( सरफ़ेस टेंशन )के कारण कोई धातु की मूर्ति दूध का मामूली अंश अवशोषित कर सकती है।  वहीं आपराधिक मामलों में उसी समय गिरफ़्तार हुए  विवादास्पद तांत्रिक चंद्रास्वामी ने अगले दिन  दावा किया कि उन्होंने ही भगवान गणेश जी से ऐसा चमत्कार दिखाने की प्रार्थना की थी।  

        अब इक्कीसवीं शताब्दी का भारत एक बार फिर 2001 में देश की राजधानी  दिल्ली में "मंकी मैन" की अफ़वाह से दहशत में हफ़्तों जिया। मीडिया में इस अफ़वाह  को जमकर स्थान मिला। मंकी मैन द्वारा जो भी किया जाता रात को किया जाता था।  अंत में यह कोरी अफ़वाह ही मानी  गयी। 

        2006 में मुंबई में समुद्र के पानी के मीठे होने की अफ़वाह फैली थी। लोग समुद्र किनारे एकत्र होकर अपना कुतूहल शांत करने के लिए समुद्र का पानी चखने एकत्र हुए। 

          मेरे पते पर अक्सर ऐसे पोस्ट-कार्ड आते रहते थे (पत्र -पत्रिकाओं में नाम के साथ पता भी छापा जाता था) जिनमें चेतावनी होती थी कि इस पोस्ट-कार्ड में लिखी बातों को ( जोकि धार्मिक बिषय होते थे ) 20 अन्य पोस्ट-कार्डों पर लिखकर पोस्ट करो नहीं तो आपका अनिष्ट हो जायेगा। कभी रास्ते  में  कोई पर्चा थमा देता था कि  ऐसे ही 1000 पर्चे छपवाकर बाँटो नहीं तो वैसा ही आपके साथ होगा जैसा इस पर्चे में उल्लेख है उन लोगों का जिन्होंने पर्चे न छपवाकर होशियारी दिखाई।  मैंने हमेशा ऐसे पोस्ट-कार्डों  और भ्रामक उल्लेख वाले पर्चों को आग के हवाले कर दिया और अपने आपको 1020 लोगों की बद-दुआएं लेने से बचा लिया।   

         अफ़वाहें करोड़ों लोगों को अपने अनुसार यदि संचालित करने लगें तो इनमें छिपे  निहित स्वार्थों को पूरा होते देख शरारती तत्व व्यापक योजना पर कार्य करने को प्रोत्साहित होते हैं। देश की धर्मभीरु जनता धूर्तों के झाँसे में आकर अपना बड़ा से बड़ा नुकसान कर बैठती है।  हक़ीक़त ज्ञात होने पर पछतावा करती है। इसीलिए कहा गया है - अब पछताए होत का जब चिड़ियाँ  चुग गयीं  खेत.....

          मास हिस्टीरिया ( सामूहिक सनकीपन ऐसी स्थिति है जब किसी स्थान विशेष के लोग कही-सुनी बातों पर विश्वास करके खुद भी वैसा ही करने लगते हैं ) ,शेयर्ड सायकोसिस ( ऐसी मानसिक अवस्था जिसमें एक मानसिक  तौर पर अस्वस्थ व्यक्ति को देखकर दूसरा भी वैसी ही हरकतें करने लगता है ) , बहुव्यक्तित्व विकार (मल्टीपल पर्सनाल्टी डिसऑर्डर/ डिसोसिएटिव डिसऑर्डर ), ओसीडी , सिज़ोफ्रीनिया ,बाइपोलर डिसऑर्डर ,उन्माद , अवसाद जैसे मानसिक रोगों के बारे में जनता को जाग्रत करना ज़रूरी है। मनोवैज्ञानिक अंतर्द्वंद्व से घिरे लोग जो सुनते हैं और देखते हैं उसे अपने साथ घटित होने जैसा मानने लगते हैं।

          वर्तमान में आर्थिक समस्याओं का भारी  बोझ और समय की कठिन चुनौतियां  मानसिक रोगियों की संख्या में तेज़ी से इज़ाफ़ा कर रही हैं। मनोरोगियों के लिए देश में साधन और सुबिधाओं की भारी कमी है। मनोचिकित्सक बड़े शहरों में ही उपलब्ध हैं।  ग्रामीण जनता ओझाओं और तांत्रिकों के फेर में उलझी रहती है
और कई ज़िंदगियाँ समुचित इलाज के अभाव में त्रासद जीवन जीती हुई ज़िदगी का बोझ ढोती रहती हैं। मानसिक रोगियों को यथोचित मानसिक रोग विशेषज्ञ के परामर्श हेतु सहज उपलब्धता होनी चाहिए। मानसिक रोग चिकित्सक से परामर्श ले रहे व्यक्तियों का समाज मज़ाक़ उड़ाता है जोकि सभ्य समाज के लिए एक बड़ी चुनौती है।
  
           विज्ञान के अनुसार भूत, चुड़ैल जैसे काल्पनिक पात्रों का वास्तविक जीवन में कोई अस्तित्व नहीं है अर्थात ये केवल डर पैदा करने वाले उपाय और अंधविश्वास हैं जिनसे उबरने के लिए लोग अपना ज्ञान दुरुस्त करें और मानसिक रूप से मज़बूत बनें। कई  लोगों के बीच  यदि कोई मानसिक रोगी कहता है कि- "वो देखो मुझे कोई दिख रहा है "  और  बाक़ी  लोगों को कुछ नहीं दिख रहा होता है  तो वह सही कह रहा होता है क्योंकि मानसिक रोगों की यह भी एक अवस्था है जिसमें  मस्तिष्क में नकारात्मक रासायनिक बदलावों के कारण रोगी दृष्टि -भ्रम का शिकार हो जाता है।    समाज में व्याप्त अंधविश्वासों को सयाने अब कमाई का ज़रिया बना चुके हैं जिसकी हक़ीक़त हमें समझनी होगी। अंधविश्वासों से ख़ुद को बाहर निकालना होगा। शिक्षा का स्तर सुधारना होगा। विचार कीजिये दुनिया हमारे बारे में इस वक़्त क्या सोच रही होगी .....? 

#रवीन्द्र सिंह यादव 


बुधवार, 12 अप्रैल 2017

नंगे होकर अपनी शर्म नीलाम न करो किसान भाइयो.........

प्रधानमंत्री  धनाड्यों से मिलते हैं ग़रीब  किसानों  से नहीं !

सोमवार  10  अप्रैल 2017  का दिन  प्रधानमन्त्री कार्यालय ( जिसे अब लोक कल्याण मार्ग नाम दिया गया है )  के  निकट  गवाह बना  तमिलनाडु के कावेरी बेसिन  से  आये  किसानों के नंगे  होकर  दौड़ने और  सड़क पर लोटने  के  असहज दृश्य का।   पिछली  14  मार्च  2017   से   अपनी मांगों को लेकर आंदोलनरत  किसान  अपना  आपा  खोकर प्रधानमन्त्री  कार्यालय  के बाहर   निर्वस्त्र हो गए।   दिल्ली  पुलिस के  डीसीपी द्वारा  किसानों को  प्रधानमंत्री से मिलने का आश्वासन देकर  प्रधानमंत्री कार्यालय  ले जाया गया  जहां  किसानों से   एक अधिकारी को अपनी  ज्ञापन/ पेटिशन देकर  चले जाने को कहा गया। समाचारों के अनुसार  बाहर  आकर  क्षुब्ध  और आक्रोशित  किसानों  ने  वस्त्रहीन होकर  प्रधानमंत्री  कार्यालय के  निकट दौड़ लगायी  और सड़क पर लोटे। बाद में पुलिस द्वारा इन किसानों को गिरफ्तार कर लिया गया। 
किसानों का कहना है कि  कवेरी डेल्टा क्षेत्र में पानी की कमी  की विकट   समस्या के चलते पिछले साल  से अब तक 29 लाख हेक्टेयर से ज्यादा कृषि योग्य  भूमि में किसी भी प्रकार की  फसल को  नहीं उपजाया जा सका है। 

यह दृश्य निर्मम ,पक्षपाती ,जन - उद्देश्यहीन , मीडिया  के लिए एक सनसनीखेज़  ख़बर  से अधिक कुछ नहीं  बन सका।  सड़क पर बदहवास दौड़ते  और लोटते  किसान अपनी बेशर्मी  नहीं दिखा रहे  बल्कि वे तो  फ़ेसबुक ,ट्विटर ,गूगल , बिकाऊ  मीडिया  के ज़रिये मनचीता समाचार , चित्र  और देश में बहार ही बहार  है  का राग अलापने  वाली  मोटी  चमड़ी वाली , बेरहम  सरकार  को नंगा करना चाहते  होंगे।  और साथ में सन्देश भी देना चाहते  होंगे कि  अब गाँधीवादी  तौर -तरीकों का  इस सरकार  की नज़र  में कोई औचित्य नहीं बचा है। 

विपक्ष ने भी  इस आंदोलन  के दौरान  केवल  खानापूर्ति  जैसा व्यवहार  किया।  बैंकों  के क़र्ज़, साहूकार के क़र्ज़ , फसल की बर्बादी , सिंचाई के साधनों का अभाव ,सूखा ,भूख  और बेकारी आदि के चलते  राज्य में हुई किसानों की मौतों को मुद्दा बनाते  हुए  अपने मृत साथियों की  खोपड़ियाँ  गले में लटकाये  तमिलनाडु से दिल्ली पहुंचे ये किसान संवेदनहीन  सत्ता के गलियारों के  बीच  जंतर -मंतर  दिल्ली पर  अपनी मांगों  को लेकर आंदोलनरत हैं। 

तमिलनाडु में भूतपूर्व मुख्यमंत्री  जयललिता के निधन के बाद उत्पन्न राजनैतिक  संकट का भले ही  फ़ौरी  तौर  पर पटाक्षेप हो गया हो  लेकिन राज्य के किसानों की दुर्दशा की  अवहेलना  कर पाना अब  मुमकिन न होगा।  पिछले वर्ष  तमिलनाडु में चुनाव सम्पन्न हो चुके हैं इसलिए  केंद्र सरकार और राज्य सरकार को किसानों  की मांगों  और समस्याओं में कोई रूचि  नहीं है क्योंकि राजनैतिक स्वार्थ  का गणित  तो अब हिमाचल प्रदेश , उड़ीसा ,गुजरात ,कर्नाटक , म. प्र. , छत्तीसगढ़ , राजस्थान  पर टिक  गया क्योंकि  इन राज्यों में आने वाले समय में राजनैतिक दलों को चुनावों का सामना करना है।  ऐसा  देश पहली बार अनुभव कर रहा है जब  किसानों के क़र्ज़ माफ़ी  के मुद्दे को सीधे वोट  से जोड़ दिया गया। यह सौदेबाज़ी  घटिया  राजनीति  का जीवंत  उदाहरण  है। 2008  में  यूपीए-1  (पूर्व प्रधानमंत्री  डॉक्टर  मन मोहन  सिंह ) सरकार ने   देशभर के किसानों  का  लगभग 70  लाख  करोड़  क़र्ज़   माफ़ किया था। जिसका  राजनैतिक लाभ  मिला , सत्ता में 2009  में यूपीए-२ सरकार  के रूप में वापसी हुई  लेकिन किसान  अगले कुछ ही सालों में  पुनः  क़र्ज़  के दुष्चक्र  में फंसकर  आत्महत्या  करने लगे। उल्लेखनीय  है  पिछले 22  सालों में  लगभग  3 लाख  किसान  आत्महत्या  कर चुके हैं  जिनकी  अलग-अलग  वज़ह  हैं। 2008  में देशभर  में  हुई किसानों की   कर्ज़ -माफ़ी  से   किसानों की   आत्महत्याओं  में  कमी  तो  आयी  लेकिन  बंद  नहीं  हुईं।  2014   के  बाद  किसानों की आत्महत्या  का आंकड़ा  फिर बढ़ने  लगा.


उत्तर  प्रदेश में विधानसभा चुनावों के दौरान  वर्तमान प्रधानमंत्री द्वारा  वोटिंग  आरम्भ  होने के  चंद  दिनों पूर्व  ही  किसानों की क़र्ज़  माफ़ी  की घोषणा की थी जबकि कांग्रेस पार्टी का  किसानों की क़र्ज़ माफ़ी पर होम वर्क  लम्बे समय से तैयार था  जोकि  कांग्रेस -सपा  की अविश्वसनीय  जोड़ी से  चालाकी से छिन  गया। अब उत्तर प्रदेश में  1  लाख  तक के फसली  ऋण ( केवल राष्ट्रीयकृत  बैंकों  से लिए गए ) के माफ़  किये जाने की घोषणा कर  दी गयी है  जोकि  प्रसंशनीय  क़दम  है।  महाराष्ट्र  से भी किसानों के  क़र्ज़ की माफ़ी का मुद्दा  ज़ोर  पकड़ रहा है। पंजाब  में  भी  बैंक  ऋण  माफ़ी  की प्रक्रिया  शुरू  किये जाने  का दबाव  पंजाब सरकार  पर है। जो मांगेगा उसे दे देंगे  या सिर्फ अपनी  पार्टी  के शासित  राज्यों में ही क़र्ज़ माफ़ी  होगी इस पर अभी तक  केंद्र में सत्तारूढ़  दल   का स्पष्ट  दृटिकोण  सामने नहीं आ सका है।  वैसे भी अब तक  केंद्र सरकार  किसान विरोधी नीतियों  के लिए  बदनाम हो चुकी है  जिसके पास कोरे नारे भर हैं  कोई ठोस किसान-नीति  नहीं है। प्रधानमन्त्री द्वारा   किसी  एक प्रदेश  में ( जहां  चुनाव  हों )  किसानों  के  कर्ज़ - माफ़ी की  घोषणा  की  जाती  है तो यह देश के   अन्य  प्रदेशों  के किसानों के  साथ  धोखा  है।  

सत्ता की चौखट  को अब किसानों की आवाज़ सुननी  ही होगी  क्योंकि  देश की लगभग 65 %  से   अधिक आबादी  खेती -किसानी में  खपकर  अपना  जीवन -यापन  कर रही है जोकि  रोज़गार  का  अपरोक्ष  भरोसेमंद  स्वरुप है।  सरकार  बेरोज़गारी  को लेकर  परेशान  ज़रूर है लेकिन उसके प्रयास  वादों के मुताबिक़  परिणाम नहीं दे पाए।  किसानों की आय सन 2022  तक  दो गुना  करने का खोखला नारा  हम आजकल खूब ज़ोर  से सुन रहे हैं  लेकिन  बिना किसी योजना  या नीति  के ... ऐसा  नारा  देने वाले जनता  को महामूर्ख समझते हैं।  आज से ही  2019  में सत्ता  में अपनी वापसी  की घोषणा करने वाले पूरी बेशर्मी  के साथ  किसानों का मज़ाक  उड़ा  रहे हैं जबकि  जनता ने जनादेश मई  2019 तक  ही दिया है।  जनता  के सेवक जब जनता  का मसीहा  बनकर  अपना महिमामंडन  करवाने  लगें तो  लोकतंत्र  अपनी मर्यादा  के मूल्यों  से  रास्ता भटक जाता है।       

किसानों की  क़र्ज़ माफ़ी  का  विरोध  करते  केंद्रीय  वित्त मंत्री ,आरबीआई  गवर्नर  और भारतीय स्टेट  बैंक की प्रमुख  के बयान घोर  निंदनीय  हैं जोकि  सत्ता के केंद्रों और नौकरशाही  की कठोरता व  संवेदनहीनता  के  मील  के पत्थर बन चुके हैं। केंद्रीय  कृषि मंत्री  का बयान  कि  किसान  नपुंसकता  के कारण आत्महत्याएं  करते हैं  पिछले साल  खूब चर्चा  में रहा।  राजनैतिक दलों को चंदा  देने वाले धनकुबेरों  के प्रति  इनकी वफ़ादारी को क्यों न कठघरे  में खड़ा किया जाय..? पूँजी  के पुजारी  कराहती  मानवता  का दर्द  महसूस  नहीं कर पाते उन्हें  सिर्फ़  अपनी चिंता होती  है  जन  गण  मन  की नहीं। देश  की जीडीपी के चार मुख्य घटक हैं - कृषि ,सेवा -क्षेत्र ,उद्योग ,आयात एवं निर्यात।  जीडीपी में 1951  में कृषि क्षेत्र देश का योगदान  जहाँ 50 % था जो अब सरकारी उपेक्षा और बदलती  परिस्थितियों  के चलते 16 -17 % पर आ गया है।   इसीलिए सरकार के लिए कृषि क्षेत्र अब कोई दुधारू गाय नहीं रह गया है। 

ग़रीब  किसान   बैंक  या साहूकार से क़र्ज़  लेकर  खेत को   फसल के लिए तैयार  करता  है।  बैलों  को सालभर  दाना-चारा  खिलाने  और देखभाल के झंझट  से मुक्त  होने के फेर में किसान  अब ट्रैक्टर  से  खेत  जुतवाता  है  और जुताई  की रकम अदा  करता है।  फिर  बीज , खाद ( फर्टिलाइज़र),कीटनाशक ,कृषि -यंत्र , सिंचाई  के लिए  पानी , बिजली , डीज़ल , खेत  की बाड़ ( आवारा  और जंगली पशुओं से  फसल को बचाने  हेतु   कटीले  झाड़ आदि खेत  की  मेंड़  पर  चारों  ओर  लगाना ) आदि में पैसा ख़र्चते हैं। खेत में  बीज बोने  से लेकर फसल की कटाई तक किसान का पूरा परिवार  इसमें खपा रहता है।  फसल पकने पर  कटाई (थ्रेसर  या अन्य मशीनों द्वारा)से लेकर  अनाज को घर / बाज़ार  तक पहुंचाने  में   किसान  का लगातार  पैसा ख़र्च   होता  है।  बाज़ार  में सरकारी  ख़रीद   में फसल के  अयोग्य  हो जाने पर  औने -पौने  दाम  पर आढ़तिया  को बेचता है और एक  सादा   कागज़  की पर्ची  लेकर घर  लौटता  है।  आढ़तिया  कुछ हफ़्तों बाद  भुगतान करता है और तौल  में भी हेरफ़ेर  करता है।  भुगतान मिलने  पर  ब्याज सहित  क़र्ज़  का भुगतान  करता है ताकि क़र्ज़  लगातार  मिलता रहे।  बचे  हुए  धन से  अपने परिवार  का गुज़ारा करता है  मतलब  किसान  हर क़दम  पर ठगा  जाता है। परिवार  में किसी सदस्य  के बीमार होने , शिक्षा आदि का  अतिरिक्त  खर्च  आने ,पालतू पशु की मृत्यु  होने ,फसल  ख़राब  होने , सूखा-बाढ़  आदि प्राकृतिक  प्रकोप  आने ,किसी प्रकार  का निर्माण  करने ,परिवार में  कोई आयोजन  होने  आदि से  किसान  के घर  का बज़ट   बिगड़  जाता है।  इस दुष्चक्र  के चलते किसान  क़र्ज़  के चक्रव्यूह  में फंसे रहते हैं  और  बिषम  परिस्थितियों का सामना  करते -करते  टूट  जाते  हैं  और आत्महत्या  जैसे त्याज्य  क़दम  उठा लेते हैं।     

हर तरह की मार सहता  किसान  पूरी ईमानदारी के साथ  मेहनत  करता है  फिर भी बदहाल है। क़माल  की बात तो यह है कि  किसान को अपना माल  खपाने  वाले   आजकल खूब मज़े में हैं। वेतन  आयोग सरकारी नौकरी  वालों  के लिए जो सिफारिशें  सरकार  को सुझाता  है उन्हें सरकार  लागू करती है  लेकिन किसानों की बेहतरी  के लिए बने आयोगों की  सिफारिशें आज भी धूल  चाट रही हैं।  सरकार  केंद्रीय  कर्मचारियों  का न्यूनतम वेतन  18000  रुपये   और अधिकतम 2.5  लाख  रुपये प्रतिमाह   करने पर  सहमत  हो जाती है लेकिन  अभावों  में जीवन  गुज़र -बसर  करने वाले किसानों  की बात भी नहीं सुनना  चाहती।  समझदार  लोग फसल के  सरकारी समर्थन मूल्य और  सरकारी  तनख़्वाह  के अनुपात  की गणना  क्यों नहीं करते..... ?  एक उद्योगपति  अपने उत्पाद  की क़ीमत  ख़ुद  तय करता  है जबकि किसान  अपने उत्पाद की क़ीमत के लिए सरकारी  नीतियों का मोहताज़  है। इसी  वर्ष  जनवरी  में  टमाटर  से भरे  सैकड़ों ट्रक उचित  मूल्य न मिलने के कारण  सडकों  पर  खाली  किये  गए।ये  टमाटर वाहनों  द्वारा  सड़क पर पिचले  गए।   एक तरफ  किसान  का टमाटर  एक रुपये प्रति  किलो  भी  नहीं बिक  सका  था  वहीँ  दूसरी ओर   धनकुबेरों  की सब्ज़ी की आलीशान   दुकानों में   40  रुपये  प्रति  किलो  आसानी  से बिक रहा था।  ऐसा  इसलिए क्योंकि  देश में लूटतंत्र  हावी  है। 

किसानों की क़र्ज़ माफ़ी  की  स्थिति  बार -बार  पैदा न हो  इसके लिए  देश में किसान - नीति  का अस्तित्व में होना ज़रूरी  है।  कोरी  लफ़्फ़ाज़ी  किसान  की दुखती  रग  को छेड़ती  है  और उसके घावों पर नमक डालती है। आजकल भारतीय राजनीति  मसीहावाद   और लोकप्रियतावाद  के संक्रमण  से ग्रस्त  है  जोकि  भविष्य  की  अंधकारमय तस्वीर  का  एक धुंधला स्वरुप है।  आजकल हम समाचार पढ़ते हैं -" प्रधानमन्त्री  के दख़ल  से  फलां  बच्चे / बच्ची  का इलाज़  हो गया , फलां  सड़क  का नाम बदल गया , फलां  गाँव का नाम बदल गया, फलां को पासपोर्ट  मिल गया आदि-आदि "........   ये समाचार  आजकल मीडिया  में खूब  चटख़ारे  लेकर परोसे  जा रहे  हैं। न  ऐसे  समाचार  छपवाने वालों को  शर्म है न  छापने  वालों को।  किसी पीड़ित  का इलाज़  क्या अब  सत्ता  में शीर्ष पर बैठे  व्यक्ति  के दख़ल  से ही हो पायेगा ..?  ऐसी व्यवस्था सुनिश्चित क्यों नहीं की जाती कि  किसी अंतिम पायदान  पर खड़े पीड़ित को हर हाल में इलाज़ की सुबिधायें मुहैया  हो सकें ? मरीज़  अस्पतालों के गेट पर दम  तोड़ देते हैं  और व्यवस्था  निष्ठुर  होकर सोती रहती है।  लोग अपना  दिल और  दिमाग़   इस्तेमाल करें फिर   प्रधानमंत्री कार्यालय   के पास  निर्वस्त्र  हुए  किसानों  के  असहज व्यवहार  की निंदा करें। हालांकि  सार्वजनिक  स्थलों पर  वस्त्रहीन  हो जाना  क़ानूनी  अपराध  है। 

प्रधानमंत्री  से देश  का पूंजीपति , फिल्म - कलाकार, तथाकथित  देशभक्त व  समाजसेवक  बेरोकटोक  जब चाहे  मिल सकते  हैं लेकिन  ग़रीब  पीड़ित   किसान  नहीं  जोकि  अपना आंदोलन  पिछले  तीन सप्ताह से भी अधिक समय से  अहिंसक  तरीकों  से ज़ारी रखे  हुए  हैं।  गंभीर  शोचनीय  मुद्दा  है  कि  देश के निर्माण  में शांतिपूर्वक  अपना रचनात्मक  योगदान करने  वाला किसान सरकार की ऐसी उपेक्षा  का शिकार  क्यों है...?  भूमि -अधिग्रहण क़ानून  में संशोधनों  को लेकर  मात खा चुकी केंद्र सरकार किसानों  से इतनी नफ़रत  करती  है यह  तो  उसके व्यवहार  से अब स्पष्ट हो चला है।  

महसूस कीजिये  एक धमक  कि हम  कैसा  भारत  बना  रहे हैं।  भुखमरी  और बेकारी  से जूझते  भारत  को  विकास  के ऐसे रास्तों की तलाश  है जहां  सबको  समान  अवसर  मिलें।  देश  में  खाया  पिया  चंगा  और अघाया  एक वर्ग है  जो  येन केन प्रकारेण  राष्ट्रीय  संपत्ति  पर  पूर्णतः  आधिपत्य  जमाना  चाहता  है  जहां  ग़रीब  और ग़रीबी  की चर्चा  सिर्फ़  इसलिए होती है कि  इनका इस्तेमाल  अपने हित  साधने के लिए  कैसे किया जाय  इनकी भलाई  का चिंतन  इनके बीच  निषिद्ध  है  केवल बयान  देना  फैशनेबल  शग़ल  है।     
  @रवीन्द्र  सिंह  यादव 

















नंगे होकर अपनी शर्म नीलाम न करो किसान भाइयो.........

प्रधानमंत्री  धनाड्यों से मिलते हैं ग़रीब  किसानों  से नहीं ! 

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बुधवार, 22 मार्च 2017

गंगा -यमुना को मिला न्याय


एक  मुस्लिम भाई  ने हिंदुओं की आस्था से जुड़ीं गंगा -यमुना को दिलाये  ज़िंदा इंसान   के  हक़....  

 

20  मार्च  2017  का दिन  पर्यावरणवादियों , प्रकृति-प्रेमियों और  भारतीय संस्कृति पर  गर्व  करने वालों के साथ-साथ  नदियों  के प्रति अगाध   श्रद्धा  रखने  वालों  को गदगद  कर  देने वाला रहा  जब उत्तराखंड  के नैनीताल उच्च  न्यायलय  ने  भारत  की  सनातनी  आस्था  से जुड़ीं प्रसिद्द  नदियों  गंगा-यमुना के साथ  इनमें मिलने वाली अन्य सहायक  नदियों को  इंसानी  क़ानूनी  हक़  देते  हुए अभूतपूर्व  आदेश दिया।  भारत  में  ऐसा क़ानूनी  आदेश  पहला  क़दम  है  जिसे  न्यायमूर्ति आलोक  सिंह  व  न्यायमूर्ति  राजीव  शर्मा  की खंडपीठ  ने  हरिद्वार  निवासी  मियाँ मोहम्मद  सलीम द्वारा  दायर  की गयी  जनहित  याचिका के निबटारे  के वक़्त दिया।

        भारत  में सनातनी  श्रद्धालु गंगा - यमुना  को देवी  के रूप में पूजते  हैं।  वैदिक-साहित्य में इनका स्पष्ट उल्लेख मिलता है।  वेदों में इन नदियों का ज़िक्र  है।  यमुना को वेदों में  यमी ( मृत्यु  के देवता यमराज  की जुड़वां बहन ) और कालिंदी ( श्रीकृष्ण  की 8  पटरानियों में से एक ) के  नाम से  स्थान  प्राप्त  है।  गंगा  की कथा  में  उसके देवलोक से  पृथ्वी  पर  उतरने  तक के वृहद्  वृत्तान्त  हैं। राजा भगीरथ  के  अथक  प्रयासों  से गंगावतरण  की कथा  रोचक है।  त्रिदेवों का  गंगा  से जुड़ाव  होने की  वैदिक - कथाएं  भारतीय जनमानस (  विशेषकर हिंदुओं ) को गंगा  के प्रति  घोर  आस्थावान  बनाती  हैं।  गंगा जल से लेकर गंगा-स्नान  तक सभी भारतीय संस्कृति  की पहचान  से लिपटे  हुए हैं।

             नैनीताल उच्च  न्यायालय  ने 8  सप्ताह  के भीतर  गंगा प्रबंधन  बोर्ड  के गठन  का आदेश  केंद्र  सरकार को दिया है।   गंगा -यमुना  की ओर  से  न्यायालयों  में वाद  दायर  करने  के अधिकार  नमामि  गंगे  प्राधिकरण ,मुख्य  सचिव और महाधिवक्ता  को दिए  गए हैं.  वहीं  दूसरी ओर   कोई  पीड़ित व्यक्ति  भी  इन नदियों  के  विरुद्ध  इनके द्वारा  पहुँचाये   गए   नुकसान  की भरपाई  के लिए  वाद  दायर  कर सकेगा।  उदाहरण  के तौर यदि  किसी  किसान का खेत  इन  नदियों  के  कारण उजड़  जाता  है या उसमें  नदी  की गन्दगी  आ जाती  है तो उसे इनके  विरुद्ध  मामला  दायर करने का अधिकार  होगा।   वहीं  इन नदियों  को प्रदूषित  करने ( कूड़ा -कचरा  आदि  फेकने ) , इन नदियों की तयशुदा  सीमा  के दायरे  में किसी भी प्रकार का अतिक्रमण  होने , इन नदियों में जल कम  होने  आदि पर  सम्बंधित  अधिकारियों की  ओर  से  दोषी  के विरुद्ध  सिविल  कोर्ट  या अन्य न्यायालयों  में मामला  दायर  किया जा सकेगा।

           अभी इन नदियों  में प्रदूषण  के  मुख्य कारण  हैं - शहरों के गंदे  नालों का इन नदियों में मिलना, इनके किनारों पर बने  होटल ,आश्रम ,व्यावसायिक प्रतिष्ठान आदि  का प्रदूषित  जल  जोकि बिना  किसी  प्रकार  के शुद्धिकरण के सीधा  इन नदियों में मिलाया जा रहा है , कारखानों -उद्योगों का  प्रदूषित  जल  एवं  मलवा  इनमें मिलना , सीवर लाइन ( मल - मूत्र ) को सीधे  इन नदियों  में मिलाना , शहरों  में  घर-घर  से निकला  प्रदूषित  जल  नालियों - नालों  से बहता  हुआ सीधा  इन नदियों में मिलना ,डेरी से लेकर  बूचड़खानों  तक का  गोबर , मांस ,रक्त  आदि, सभी प्रकार  का  कूड़ा-कचरा  डालना , पूजा -सामग्री  को सिराना , मूर्ति -विसर्जन करना ,अनाधिकृत सामूहिक आयोजन, किनारों पर  शौचादि  करना , पशुओं को स्नान  कराना , मुर्दों को बहाना , मुर्दों  और  जलाऊ  लकड़ी  व  कंडों (उपलों) के  जलने से  उत्पन्न  राख को इनमें बहाना , खादर क्षेत्र में  अतिक्रमण  कर  खेती करना , अस्थायी आवास  बनाना , अनेक अंधविश्वासों  से जुड़े  आयोजन आदि।

             पिछले वर्ष  दिल्ली  में 11 -13  मार्च  2016  के बीच  संपन्न  हुए  आर्ट  ऑफ़ लिविंग  फाउंडेशन के आयोजन World Culture Festival  ने  यमुना की  ओर  ध्यान  खींचा  था  जब   एनजीटी ( राष्ट्रीय  हरित  न्यायाधिकरण ) ने  इस  आयोजन  के चलते  श्री श्री  रविशंकर  की संस्था  पर यमुना  के पारिस्थिति -तंत्र (  Eco System) को  नुकसान पहुँचाने  व  प्रदूषण  फैलाने  के  कारण  5  करोड़  का अर्थदंड  बसूला  था।

             दिल्ली  में  यमुना  बेहाल  है।  यहां  अतिक्रमण का विकराल  रूप  देखा जा सकता है।  दिल्ली  में यमुना  पर बने पुलों से  लोगों को  कार या दुपहिया  वाहन रोककर  पूजा में उपयोग  हुई सामग्री को पॉलीथिन में  बांधकर  फेकते  हुए  देखा जा सकता  है। यमुना नगर ( हरियाणा) से दिल्ली   आते - आते यमुना  के जल  का बहुतायत  हिस्सा  वज़ीराबाद -बैराज़ पर  दिल्ली  शहर  को  जल आपूर्ति  के उद्देश्य से  रोक  लिया जाता है।  इससे आगे  गंदे  नालों  और सीवर  लाइन  का  प्रदूषित  जल ( प्रदूषित  जल को शुद्ध  करने वाले  प्लांट  भी स्थापित हुए हैं दिल्ली में ) यमुना नदी को ज़िंदा  रखता  है।

            हिमालय  में यमुनोत्री ( ज़िला उत्तरकाशी  उत्तराखंड ) से निकलकर   हिमाचल प्रदेश की सीमाओं से गुज़रती  हुई  उत्तराखंड ,हरियाणा , उत्तर प्रदेश की सीमाएं  छूती  हुई बागपत ,यमुना नगर से  दिल्ली  शहर  में प्रवेश  करती  है यमुना। हिमाचल प्रदेश से आयी टोन्स  नदी  देहरादून  के निकट  कलसी  पर यमुना में मिलती  है आगे  उत्तराखंड की गिरी  नदी भी यमुना में मिलती  है।  दिल्ली से बहार निकलते हुए  ग्रेटर  नोएडा  में  सहारनपुर  से आयी  हिंडन  नदी भी यमुना में मिलकर इसके बहाव को  समृद्धि  प्रदान करती है।  आगरा से आगे रिठाई  के पास राजस्थान से आयी उत्तांगन  नदी  यमुना में मिल जाती है।  अलीगढ़  से आयी सेंगर  नदी भी कालपी  हमीरपुर  के बीच  यमुना में बायीं  ओर  से  मिल जाती है।
       
             यमुना  नदी  में गन्दगी  की  मात्रा  में  दिल्ली  व  इससे  आगे के शहर / कस्बे  इज़ाफ़ा  करते हैं. दिल्ली से  फ़रीदाबाद  ,वृंदावन ,मथुरा ,आगरा ,फ़िरोज़ाबाद ,बटेश्वर ,इटावा  की  गन्दगी समाहित करती हुई यमुना आगे बढ़ती  है. इससे  आगे इटावा  ज़िले की  चकरनगर तहसील के गाँव  मितरौल , कछपुरा , डिभौली ,डिलौली कछार ( डिलौली  बाबा का स्थान ),इकनौर , रनियां ,खिरीटी , गुहानी  होते हुए  भरेह गाँव  तक  पहुंचती  है जहाँ यमुना  में चम्बल  नदी  आकर  मिलती है।  यहां  से चम्बल  का नाम  समाप्त हो जाता है।  आगे  बढ़ते हुए  यमुना नदी  इटावा - जालौन ज़िलों  की सीमाओं  पर  स्थित सांस्कृतिक - ऐतिहासिक स्थल पंचनदा (पचनदा= पांच  नदियों का संगम ) कालेश्वर  मंदिर बिठौली ( इटावा)  और दूसरी ओर  बाबा साहब का मंदिर   कंजौसा( जालौन )  गाँव पर   तीन  नदियों ( सिंध,पहूज, क्वारी ) की  धारा जोकि  कुछ ही दूरी  पर  आपस  में मिलती हैं( सिंध -पहूज नदियाँ   सुल्तानपुरा ,जाएघा ,बिलौंड  के पास  मिलती  हैं  और आगे भिटौरा  पर क्वारी  नदी भी मिल जाती  है ) को  अपने  में समाहित  कर  लेती है। अब  आगे  बढ़ती  है  यमुना  के नाम  से एक बड़ी  नदी। यहाँ  बने  पुल   पर  खड़े  होकर  उत्तर -पूर्व  की ओर  से  आती हुई  यमुना ( चम्बल -यमुना की धारा  ) और  दक्षिण-पश्चिम की ओर  से आती हुई सिंध ( सिंध ,पहूज ,क्वारी ) की  धारा  जब आपस  में यहां  मिलती है तो  तीसरी  धारा  दक्षिण  की ओर  यमुना  के नाम से  बढ़ती  है  जो आगे  मोड़  लेकर  ततारपुर के निकट पूर्व  दिशा  की ओर   हिम्मतपुर , जुहीखा    होते हुए औरैया  ज़िले  की ओर  बढ़ती  है।

            पंचनदा  अब एक सांस्कृतिक  विरासत  का केंद्र  है  जोकि  सरकारी  उपेक्षा  का शिकार  है. यहां  बाबा  साहब का मंदिर  प्राचीन समय से श्रद्धा  का केंद्र  बना हुआ है। यहां  कार्तिक मास  की पूर्णिमा  को  विशाल  मेले का आयोजन  होता है।   यह स्थान  जगम्मनपुर  रियासत  के इतिहास से जुड़ा हुआ है। यहाँ  का मनोहारी  दृश्य  फिल्मकारों  को अपनी ओर   खींच  सकता  है लेकिन  डाकू -समस्या  से पीड़ित  रहा यह  क्षेत्र  कुख्यात  है  इसीलिए  यहां  पर्यटन  की संभावनाओं को सरकारों ने नज़रअंदाज़ कर दिया है। यमुना  पंचनदा  से आगे  जुहीखा , हिम्मतपुर , गुढ़ा ,महतौली  होते  हुए  औरैया  के शेरगढ़ से आगे बढ़ते हुए  कालपी की ओर  बढ़ती  है।   हमीरपुर से आगे सामुही  के पास  बेतवा  नदी  यमुना  में मिल जाती है  आगे  बांदा -फतेहपुर  के बीच  मदनपुर  चिल्ला- घाट   पर  केन  नदी  भी  यमुना  में मिल जाती  है।  अंत  में   प्रयाग में संगम पर  यमुनोत्री से इलाहबाद  तक के 1376  किमी  के सफ़र  को  समाप्त  करते  हुए यमुना (जमुना) नदी गंगा  में मिलकर अपना अस्तित्व खो देती  है। इलाहाबाद  किले से  त्रिवेणी ( तीन  जल धाराएं एक  ओर  से गंगा  दूसरी ओर  से  यमुना यहां मिलकर  नयी (तीसरी)  जलधारा  गंगा  नदी  के रूप  में वाराणसी  की ओर  बढ़ती  है।

गंगोत्री (गोमुख) से निकलकर  बंगाल की खाड़ी (समुद्र) तक  लगभग 2500  किमी का  सफ़र  तय करती  हुई गंगा इसके किनारे  बसे  शहरों ऋषिकेश ,हरिद्वार ,फ़र्रुख़ाबाद , बिठूर ,कानपुर , इलाहबाद ,मिर्ज़ापुर , वाराणसी ,बलिया ,रायबरेली , गाज़ीपुर , हाज़ीपुर ,पटना, बक्सर ,भागलपुर ,मुंगेर  होती हुई पश्चिम बंगाल के रास्ते  बांग्लादेश होती हुई समुद्र तक पहुँचती  है।

गंगा  में प्रदूषण  की  बड़ी शुरुआत कानपुर  शहर  करता है. कानपुर   से पहले बिठूर  में गंगा  का इतना बुरा हाल नहीं है जितना कि  कानपुर  से आगे  हो जाता है।  शहर  की गन्दगी से लेकर कारख़ानों  का समस्त प्रकार  का बिषैला रासायनिक उत्पाद तक  गंगा  में बहा दिया जाता है।  आगे  बड़े शहर  इलाहबाद ,वाराणसी और पटना  भी अपना-अपना योगदान करते हैं. सांस्कृतिक महत्त्व के शहर  गंगा के किनारों पर बसे  हैं  लेकिन  नदियों के प्रति  सिर्फ सरकारी  दिखावा ही नज़र  आता  है वास्तविक  प्रयास शायद  अब शुरू  हो पाएं क्योंकि  न्यायालय   के आदेश की अवहेलना  कर पाना  अब सरकारों को भारी  पड़ने वाला है।

         इन नदियों के  संरक्षण  के लिए अरबों रुपये  बहाये  जा चुके हैं और  इनके संरक्षण के नाम पर  धन का बहाया जाना  अब भी ज़ारी है।  केन्द्रीय  प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड , केन्द्रीय  जल आयोग , केंद्र  सरकार  का पर्यावरण  एवं वन  मंत्रालय , नमामि -गंगे  प्राधिकरण  आदि  सरकारी  खानापूर्ति  के रूप में कार्यरत हैं।  भारत सरकार  2002  में राष्ट्रीय  जल नीति  की घोषणा कर चुकी  है वहीँ  पर्यावरण संरक्षण  एक्ट 1986  लागू है।  न्यायालय  का दख़ल  इन नदियों  के  दिनोंदिन होते   बदतर   हालात  पर  सामने आता रहता है। गंगा  बचाओ  आंदोलन , यमुना बचाओ  आंदोलन  भी  अपनी-अपनी रफ़्तार  से  चलते  आ रहे हैं।  राजनीति  चुनावों  के मौसम  में इन नदियों  की सबसे  बड़ी  हितैषी  बनकर  उभरती है  और  नदियों  के प्रति  आस्था  और विश्वासों  से जुड़े  भावनात्मक   मुद्दों  को   बड़ी चतुराई  से जनता के बीच  पेश करती है, तब ऐसा लगता  है कि  अगले ही क्षण  सब कुछ जादुई  ढंग  से बदल जाने वाला है।  देश  की जनता को जागरूक  होकर  जीवनदायिनी  नदियों के प्रति  अपने कर्तव्यों  का पालन  करना होगा  तभी सार्थक परिणामों की उम्मीद फलीभूत होगी।

दुनिया में  पहली बार  न्यूज़ीलैंड की एक नदी Whanganui को  जीवित  व्यक्ति के कानूनी हक़  देने का समाचार सितंबर  2012  में आया था।  भारत  में  सनातनी श्रद्धालुओं ( हिंदुओं) की आस्था  से जुड़ीं  नदियों को  जीवित व्यक्ति के अधिकार  दिलाने  वाले  मियाँ  मोहम्मद  सलीम के प्रयासों की  सराहना  होनी चाहिए  जिन्होंने  गंगा -जमुनी  तहज़ीब का अनूठा  उदाहरण  पेश किया  है  जबकि  भारत में हिन्दू-मुस्लिम एकता  की जड़ें  खोदने के राजनैतिक  प्रयास अपने चरम  पर हैं।  
                                                                                    - रवीन्द्र सिंह यादव

रविवार, 12 मार्च 2017

मंगलवार, 7 मार्च 2017

सिर्फ़ एक दिन नारी का सम्मान, शेष दिन ........ ?




8  मार्च  अंतर्राष्ट्रीय  महिला  दिवस 


मही अर्थात धरती , जिसे हिला कर रख  दे  वह  है  महिला।   8  मार्च   संयुक्त  राष्ट्र  संघ   द्वारा महिलाओं के सम्मान  को  समर्पित  दिन  है जिसके आसपास  के  दिन भी  नारी - अस्मिता  के उल्लेखों से सराबोर  रहते हैं. विश्व पटल  पर  नारी  की  सामाजिक, आर्थिक  और राजनैतिक  दशा  और  उपलब्धियों  के  बख़ान  का यह दिन  गुज़र  जाता है कुछ  विचारोत्तेजक ,सारगर्भित  चर्चाओं  और प्रकाशनों के साथ।

वर्ष  के शेष   दिन.....?


संघर्ष     के    दिन ,


अपमान   के   दिन ,


उत्पीडन    के     दिन ,


अंतहीन  पीड़ा  के दिन ,



ख़ुशी और ग़म  के   दिन ,


सजाकर  पेश करने के दिन ,


प्रताड़ना   और  तानों  के  दिन,


गौरव   /  अभिमान   के     दिन ,


त्याग  और  समर्पण    के    दिन ,



प्रतिबन्ध   और  वर्जनाओं  के  दिन ,


मन   मारकर    रह   जाने   के   दिन ,


पुरुष-सत्ता  के  क्षोभ  सह  लेने  के  दिन ,


समाज    की   दोगली   सोच      के    दिन ,



कामुकता से उफनते पुरुष की कुदृष्टि  के  दिन,


भोग्या  की  नियति  होकर  मर-मर कर  जीने  के  दिन,


माँ,   बहन ,  भार्या ,   बेटी     होने    के     दिन ,



समाज  के  क़ानून   को  ढोने   के दिन,


दिन  पर   दिन ......364   दिन ,


नारी -सम्मान  का  स्मरण ,


फिर  8  मार्च  के  दिन,


सिर्फ़  एक  दिन... ?


नारी  के सम्मान  में  स्थापित  विचार -

यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवतः,

 ”जननी जन्म भूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी”,

‘मातृदेवो भवः’ ,

पुरातन  काल से  अब तक नारी-संघर्ष की  गाथा  अनेक आयामों से भरी हुई है।  हिंसा  और लूटपाट का दौर  थमा  तो  समाज  ने व्यवस्थित  जीवन  के लिए  नियमावली  तैयार की  और दुनिया में  महिला अधिकारों के साथ  क़ानून  अस्तित्व  में आये  फिर भी दुनिया में  स्त्रियों के लिए  सभी देशों  में समान  अधिकार नहीं  हैं। कहीं  नारी  स्वतंत्रता का ऐसा  बोलबाला है कि  स्त्रियां  पुरुषों  के उत्पीड़न  का कारण  तक बन गयीं हैं तो कहीं ऐसी  स्थिति  भी सामने आयी  कि  महिलाओं  को मतदान  तक का अधिकार  नहीं दिया गया।  महिला-पुरुष मज़दूरी  तक में भेदभाव  रखा गया। 

स्त्रियों पर जबरन अपनी सोच थोपता  रहा समाज  आज  उनके जाग्रत  होते जाने  से  उथल-पुथल  के दौर से गुज़र रहा है। कोई  स्त्री  के वस्त्र धारण  करने के तौर - तरीकों पर अपनी कुंठा  बघार  रहा है तो कोई  स्त्री  को रात  में घर  से बाहर न निकलने  की  सलाह दे रहा है लेकिन  उन वहशी  दरिंदों  को कोई  कुछ  नहीं कहता जो किसी  न किसी  घर  के बेटे  हैं जो  स्त्री  की गरिमा  को  धूल  में मिलाने में  ज़रा  भी शर्म  नहीं करते।

कोई धार्मिक -ग्रंथों  की व्याख्या  को अपनी संकुचित  सोच का  जामा  पहनाकर  पेश कर रहा है तो कोई नारी-स्वतंत्रता एवं  बराबरी  के हक़  के लिए  आनदोलनरत  है। महिला -उत्पीड़न  के समाचारों  का ग्राफ़  नई  ऊँचाइयाँ  छू  रहा है क्योंकि  उद्दंड  युवा  पीढ़ी  स्त्रियों  के  प्रति  नफ़रत  और  कलुषित  भाव  से भर  गयी  है। परिवारों के बिखरने  का सिलसिला  रफ़्तार  पकड़ रहा है।

ग़रीब  स्त्री  आज भी समाज के अनेक प्रकार के शोषण  और अत्याचार  का शिकार बनी  हुई है।   समाज का चतुर-चालाक  तबका  अंधविश्वास और अशिक्षा  का भरपूर  लाभ उठा रहा है। केरल  के  एक पादरी  का बयान  कि  जीन्स  पहनने वाली  महिलाओं  को  समुद्र  में  फिकवा  देना चाहिए , नगालैंड   में महिला  आरक्षण  का पुरुषों द्वारा  तीव्र  विरोध , 3  तलाक़  पर भारत में छिड़ी  बहस , सिनेमा  में  स्त्री  को किस रूप में पेश  किया जाय इस मुद्दे पर  बहस  ज़ारी  है।

भारत में  महिला उत्पीड़न  को  रोकने  के लिए 16  दिसंबर  2012  की रात  दिल्ली  में घटित  निर्भया - काण्ड  के बाद हुए आंदोलन के उपरान्त   सर्वोच्च  न्यायलय  के  अवकाश प्राप्त  न्यायाधीश जस्टिस  जे.  एस.  वर्मा ( अब स्वर्गीय)  की अध्यक्षता  में बने  तीन  सदस्यीय आयोग ने  बेहद  सख़्त  क़ानून  का ख़ाका  पेश किया जिसे भारत सरकार ने 3  अप्रैल 2013  से  लागू कर दिया  फिर भी सरकारी  मशीनरी  उस क़ानून  को  लागू कर पाने में भ्रष्टाचार और राजनैतिक दखल के चलते  असफल  होती चली आ रही है  जिसमें  महिलाओं  को घूरने, पीछा  करने , बिना  सहमति  के  शरीर  को हाथ  लगाने ,इंटरनेट  पर महिलाओं की जासूसी करने  आदि तक  को  ( तब तक  उपेक्षित  मांगों )   भी शामिल किया गया है।

नारी को  समाज  में प्रतिष्ठा  और अधिकारों  के लिए  अभी लंबा  संघर्ष  करना है।  शिक्षा  एक ऐसा हथियार  है जो स्त्री  को उसके  वांछनीय  गौरव  को  हासिल होने  में सहायक सिद्ध  हुआ है।  आज हम देखते  हैं कि  निजी क्षेत्र  में  स्त्रियों  को बढ़ावा  दिया  जा रहा है  उसके पीछे  भी  समाज   की उदारता  नहीं बल्कि  कायरता  छुपी है  क्योंकि  वह  जानता  है कि  स्त्री  कानूनों  के चलते  उनके कार्यस्थल  सुरक्षित  रहेंगे  और  स्त्रियों  के प्रति दया  भाव  और  उनका आकर्षण  उनकी   व्यावसायिक  सफलता  का हेतु  बनता है।

स्त्रियों  से आह्वान किया जाता है  कि  अब  जागो , ख़ुद  को बुलंद  करो ,अपना मार्ग प्रशस्त  करो  जिससे फिर कोई महाकवियत्री महादेवी  बनकर  न लिख  दे  " मैं  नीर  भरी दुःख की बदली "


आज अंतर्राष्ट्रीय महिला  दिवस  पर  महिलाओं  को मेरा नमन।

भारत  में ग्रामीण क्षेत्रों में  महिलाओं  की स्थिति  का  एक उदाहरण  मैं  अपनी  यू  ट्यूब  पर प्रस्तुति " ज़िन्दगी  का  सफ़र  पगडंडियों पर " के मार्फ़त  प्रस्तुत कर रहा हूँ  जिसमें एक विधवा  पिछले 22  वर्षों से  विधवा -पेंशन के लिए संघर्षरत  है।  14  मिनट  8  सेकण्ड  का समय  देना ज़रूरी  है  यह जानने  के लिए  कि  जिनके  पास शब्द और साधन  नहीं हैं उन महिलाओं  पर क्या  बीतती  है जीवनभर......
जिसका लिंक है -
https://youtu.be/Nbxufhttps:/hMHgDQ

                                                                              - रवीन्द्र  सिंह  यादव



शुक्रवार, 3 मार्च 2017

सोशल -मीडिया कितना सोशल रह गया है ?



सोशल -मीडिया  कितना  सोशल  रह  गया  है ? यह सवाल अब हमारे  ज़हन  में बार-बार  कौंधने लगा  है। आजकल  फेसबुक , ट्विटर , यू  ट्यूब , इंस्टाग्राम ,लिंक्ड इन ,पिनटेरेस्ट ,गूगल प्लस ,आदि  लोकप्रिय नेट्वर्किंग साइट  हैं.  अब   ब्लॉगर और ऑनलाइन  अख़बार  भी  सोशल मीडिया  का प्रतिनिधित्व  करते नज़र आते  हैं।  

      युवाओं  के  बीच  फेसबुक  सर्वाधिक  लोकप्रिय  सोशल मीडिया साइट है। इस  साइट  के साथ अनेक विवाद भी जुड़  गए हैं.  विडियो  के लिए  यू  ट्यूब अग्रणी  साइट है। जिस पर  अति  उत्साही  लोग अनेक प्रकार की आपत्तिजनक सामग्री  को भी अपलोड कर देते  हैं।  यह सिलसिला  अब भयावह  रूप लेता जा रहा है. आप देखना कुछ और चाहते  लेकिन विडियो  के पार्श्व  में अनेक प्रकार की  आपत्तिजनक / वयस्क सामग्री  को देखने की अनुशंसा प्रकट हो जाती है। यदि  आप अपना विडियो  किसी को इस साइट पर देखने के लिए अनुरोध भेजते हैं तो बदले में उसे आपके विडियो  के साथ  अनावश्यक सामग्री  की झलक भी दिखाई जाती है जिससे देखने वाला अपना मार्ग भटककर इनके बनाये हुए जाल में फंसकर  विज्ञापनों की दुनिया का शिकार हो जाय। 

      हाल  ही में  भारत  की  सर्वोच्च  अदालत  में यू ट्यूब  विडियोज़  में  आपत्तिजनक  सामग्री जोकि  व्यक्ति विशेष के  चरित्र  को  तय मक़सद से अत्याधुनिक  तकनीक  से  तैयार कर बदनाम करने की नियत से           (भले  ही  सम्बंधित व्यक्ति का उससे कोई सम्बन्ध न हो ) प्रकाशित  और प्रसारित  किया  जा रहा है  पर  बहस हुई  जिसमें  यू ट्यूब  का जवाब  हमें  असहाय  होकर  बदनामी  झेलने  पर  मज़बूर  कर देने वाला  है.  इस साइट  का कहना  है  कि  रोज़ाना  इतने वीडियो  अपलोड  होते हैं कि  उन सबकी जांच के लिए उसे 5  लाख   कर्मचारी   नियुक्त  करने होंगे जोकि उसके लिए संभव नहीं है।  

    हाल ही में भारत  में एक फेसबुक  पोस्ट ज्वलंत  मुद्दा  बन गयी  जोकि  विगत 22  फरवरी 2017 को दिल्ली के एक महाविद्यालय  में दो विश्वविद्यालयों   के छात्रों व  शिक्षकों  के बीच  अभिव्यक्ति  की आज़ादी  को लेकर हुए  टकराव  में हिंसा से  व्यथित  कारगिल  शहीद  की बेटी  ने  एक छात्र  संगठन की  उपद्रवी गतिविधयों को कठघरे  में खड़ा किया।  उस युवती  को जवाब में अश्लील  गालियों की बौछार  का सामना करना पड़ा साथ ही  गैंगरेप  की खुली ऑनलाइन  धमकी  भी मिली।  लोगों ने ऐसा महसूस किया  जैसे  क़ानून अब  असहाय  हो चुका  है। इसके विरुद्ध जब  उस  युवती  के पक्ष में  प्रबुद्ध  लोग खड़े हुए  और  लेखन सक्रियता  बढ़ी  तब  इस धमकी  और अश्लील गालियों  के  विरुद्ध दिल्ली  पुलिस ने प्रथम सूचना रिपोर्ट  दर्ज़ की  है. दिल्ली महिला आयोग ने भी फेसबुक  से  सम्बंधित आपत्तिजनक  पोस्ट  लिखने वाले की पहचान  बताने के लिए पत्र  लिखा है। 
    
      उस  पोस्ट  के कुछ शब्दों  को छुपाकर शेष  शब्द  कुछ ऑनलाइन  अखबारों में छपे  जोकि  घोर निंदनीयऔर असहज  स्थिति पैदा  करने वाले हैं।  एक खिलाड़ी ने  उस युवती  के एक साल पहले के विडियो पोस्टर  का  मज़ाक  बना डाला जिसमें  लिखा था कि  "मेरे पिता को पाकिस्तान  ने नहीं युद्ध ने मारा  है ", एक बेटी जो अपने पिता को  2  वर्ष की उम्र में कारगिल -युद्ध (मई -जुलाई 1999 ) में  देश के लिए कुर्बान  हो जाने पर  दो देशों के बीच  अमन  का सन्देश  देने की सार्थक कोशिश करती है  उसकी कोमल भावनाओं को कुछ लोग देशद्रोह से जोड़  देते हैं तब बदले  में कुछ खिलाडी, लेखक, पत्रकार , कलाकार , बुद्धजीवी  वर्ग और मीडिया का एक वर्ग उसके  अदम्य  साहस  को संबल  देने उसके साथ खड़े  नज़र  आते हैं।  अंतरराष्ट्रीय मीडिया  भी देश में इस मुद्दे पर फैलाये जा रहे  भ्रम पर  टिप्पणियां  करता  है। इस मुद्दे पर अभी भी बहस गर्म है।  देश में चुनावी माहौल  है। ज़रूरी  है कि  हम सोशल मीडिया  की अच्छाइयाँ  और बुराइयाँ भलीभांति समझें और  बच्चों  की उत्सुकता  को सही दिखा में मोड़ें.  इंटरनेट  पर असामाजिक   तत्वों की पहचान को सुलभ बनाया  जाय  और संयुक्त  राष्ट्र संघ  में ऐसा  कानून  बने जोकि  सब देशों पर लागू  हो जिससे इंटरनेट पर आपराधिक  तत्वों  की कुंठा  को नियंत्रित  किया जा सके। यह मुद्दा  आपके समक्ष  बहस के लिए पेश किया जा रहा है। 

    नवभारत टाइम्स डॉट कॉम  के संपादक श्री  नीरेंद्र  नागर  के ब्लॉग  एकला  चलो के  ब्लॉग शीर्षक "

भेड़िये ने मेमने से कहा- तुमने देश को गाली क्यों दी?"

पर  मेरी  टिपण्णी - 
Ravindra Singh Yadav19926
•New Delhi
आपका व्यंग आग में घी डालने आ गया है. ज़रूरी है जब विचारधारा की लड़ाई श्रेष्ठता को लेकर हो तब क़लम ख़ामोश न बैठी रहे. अब समाचार आ गया है कि राष् ट्रीय मानवाधिकार आयोग भी इस मामले में सक्रिय हो गया है उसने दिल्ली पुलिस( जोकि पूरी तरह एक राजनैतिक समूह बन चुकी है) से 22 फरवरी 2017 की रामजस कॉलेज की उपद्रवी घटना पर जवाब मांगा है. 22 फरवरी 2017 को घटना घटती है और 28 फरवरी 2017 को राष् ट्रीय मानवाधिकार आयोग की आंख खुलती है वह भी तब जबकि उससे लिखित शिकायत की जाती है. बड़े ही अफसोस की बात है कि देश में व्यवस्था के नाम पर अराजकता का बोलबाला होता जा रहा है. एक महिला की गरिमा को समूचे भूमंडल पर तार-तार कर देने वाले कुंठित मानसिकता से भरे ग्लोबल रायटर्स के विचार अब दुनियाभर में चर्चा का बिषय हैं. इन्टरनेट पर मिली लिखने की आज़ादी को लोग इस तरह उपयोग करेंगे जिस तरह दो लुच्चों-लफ़ंगों के बीच अश्लील वार्तालाप होती है. वे नहीं जानते कि उन्हें जिस बोतलिंग-प्लांट में वैचारिक दरिद्रता की घुट्टी भर कर पैक करके बाज़ार में उतारा जा रहा है वह ख़ुद उनके लिये,परिवार के लिये,समाज के लिये,देश के लिये और दुनिया के लिये कितना घातक है. राजनैतिक निष्ठा से आप्लावित दिशाहीन युवा स्वयं को चर्चित कर किसी न किसी लाभ का आकांक्षी है और वह सोचता है कि वह जिस विचारधारा का हिमायती है वह ही अंतिम सत्य है. यही विचार फ़ासीवाद और तानाशाही का जनक है. माननीय सर्वोच्च न्यायालय से अपील है कि सरकार को स्पष्ट निर्देश दे कि महिला सुरक्षा के नाम पर बनाये गये सख्त कानून (2013) का सख्ती से पालन करे और राजनैतिक निष्ठा की ग़ुलाम होती जा रही नैकारशाही को जनता के प्रति जवाबदेह और संवेदनशील होने का स्पष्ट निर्देश ज़ारी हो ताकि सरेआम महिलाओं के बारे में अपनी कुंठा बघारने वालों की गर्दन कानून के हाथ में आ सके.
5 2 जवाब देंशिकायत क


                                                                                                     - रवीन्द्र  सिंह  यादव 

शनिवार, 7 जनवरी 2017

कितने बदनुमा दाग़ और बाक़ी हैं समाज के चेहरे पर ?



नववर्ष  की  पूर्व  संध्या (३१ दिसंबर २०१६ ) पर  कर्णाटक  की राजधानी  बैंगलुरु  में  युवतियों  से  हुई  सामूहिक  बदसलूकी  आज  के  समाज  के  खोखलेपन   का  ज्वलंत   उदाहरण  है।  एक शहर   जो  आधुनिकतम  सुबिधाओं   से  सुसज्जित   है   जहां   सुरक्षा  के  इंतज़ाम   पुख़्ता   हैं  फिर   भी  आज  देश का  आपराधिक  मनोवृति  का  युवा  कानून   को  सरेआम  तोड़ने  का  दुस्साहस  दिखा  रहा   है।  जिसने  भी  इस घटना   के  वीडियो   देखे  वह  आक्रोश  और  गहरे क्षोभ  से भर  गया। "यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:"  जैसा   महान  दर्शन  सृजित   करने  वाला  देश  आज  कहाँ  पहुँच   गया है?

           देश   के  सितारों ( फिल्मकार  और  खिलाड़ी ),बुद्धिजीवियों , महिला संगठनों   ने  एक  ओर   इस घटना  के विरोध  में  आवाज़  उठायी  वहीं  नेताओं  ने  गैर-ज़रूरी  बयान दिए।   कर्णाटक राज्य सरकार  के गृह मंत्री का  कथन  पीड़ा  पर मरहम  लगाने  के बजाय  घाव  पर नमक  डालने  जैसा  था  वहीं   समाजवादी  पार्टी  के मुम्बई  के  नेता  ने  यहाँ  तक  कह  दिया  कि  आग  वहीँ लगती  है जहां पेट्रोल  होता  है।  नेताओं ने  महिलाओं के  परिधान  पर  तो  सवाल  उठाये   लेकिन  उन वहशीपन दिखाने  वाले  असामाजिक  तत्वों  के बारे  में  कुछ नहीं कहा।  सोशल -मीडिया  ने   अपना  दायित्व  निभाते   हुए   इस मुद्दे   को  मरने   नहीं दिया  तब  एक  हफ़्ते  बाद  राज्य  की पुलिस  ने  चार  आरोपियों  को  गिरफ़्तार  किया।

           १६ दिसंबर  २०१२  की  रात   दिल्ली   में  हुए  निर्भया-काण्ड  के बाद  महिला-सुरक्षा  को लेकर  आंदोलन   हुआ  परिणामस्वरूप  संशोधित  सशक्त  महिला -सुरक्षा   कानून  ३  अप्रैल  २०१३  से लागू किया गया।    लेकिन  आज  भी  देशभर  से  महिला-उत्पीड़न  के जो समाचार  आ रहे  हैं  उनका  सन्देश  सिर्फ इतना  है  कि  हमारा  समाज  और  व्यवस्था  महिलाओं  की सुरक्षा  को  लेकर  संवेदनशील  नहीं  हैं.

             इंटरनेट  के  साथ   पल  रही  नई  पीढ़ी  भारतीय  जीवन दर्शन  के महान  मूल्यों  से  अपने आप  को  दूर   खड़ा  कर  रही   है।  हिंसा , बल प्रयोग  और  अभद्रता  हमारे  आसपास  ही  मड़राती  रहती  है  जिसे  नवोदित  पीढ़ी  नासमझी  में  प्रायोगात्मक  रूप   देने  की  कोशिश  करती  है   जोकि  बाद  में  ख़तरनाक   शक़्ल  अख़्तियार  करती  है।  महिलाओं  पर  अत्याचार  की  सोच  दबी हुई कुंठा  से  उपजी है  जो  हमारे  सामने  वीभत्स  रूप   में  प्रकट   होती   है।

            भीड़तंत्र   में बढ़ता   हमारा   विश्वास   आत्मघाती   है।    एक  नेता   को  हमने पिछले  दिनों  उसकी  सभा  में  आयी   भीड़  से   आल्हादित   होते   देखा।   किराए  की  भीड़  स्वार्थवश  नियंत्रित  हो  सकती  है।  किसी  विचारधारा  के  साथ  जुडी  भीड़  अपने  आप को श्रेष्ठतर  दिखाने  के फेर  में  अनुशासित  हो  सकती  है
लेकिन   निरुद्देश्य  लापरवाह  उन्मादी   भीड़  का कोई  धर्म -ईमान   नहीं  होता  उसमें शामिल  लोग  चेहरा  छुपाकर   कुंठित   मानसिकता   का  भरपूर  प्रदर्शन  करते  हैं।

             कला   के  नाम  पर  कामुकता   को  बेचने  वाला  सिनेमा आज  विशुद्ध  व्यावसायिक  लिबास  में  हमारे  सामने  खड़ा    है।  बच्चे   अब  संस्कार  परिवार  के  बुज़ुर्गों  से  आत्मसात  करने  के बजाय   सिनेमा , टेलीविज़न  धारावाहिकों  और  अंतर्जाल  ( इंटरनेट)  को तरज़ीह  दे  रहे  हैं।  परिवारों  से  लेकर   जीवन  के हरेक क्षेत्र   में अनुशासनहीनता  ने अपने पाँव   पसार   लिए   हैं।   ऐसे   में   हमारा   लोकतंत्र   में  जीने   का  सपना  कहीं   हमसे   छिन   न  जाय  यह   भय  भी  मानस  को  मथने  लगा   है  क्योंकि  दोषारोपण  मात्र  से  व्यवस्था  अपना  अभीष्ट  हासिल   नहीं  कर  सकती।  परिवार  अपने  बेटों  को  महिलाओं  का सम्मान  करने  के  लिए   मौलिक  भावभूमि  का  निर्माण   करें।

                                                                                            - रवीन्द्र  सिंह यादव