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बुधवार, 22 मार्च 2017

गंगा -यमुना को मिला न्याय


एक  मुस्लिम भाई  ने हिंदुओं की आस्था से जुड़ीं गंगा -यमुना को दिलाये  ज़िंदा इंसान   के  हक़....  

 

20  मार्च  2017  का दिन  पर्यावरणवादियों , प्रकृति-प्रेमियों और  भारतीय संस्कृति पर  गर्व  करने वालों के साथ-साथ  नदियों  के प्रति अगाध   श्रद्धा  रखने  वालों  को गदगद  कर  देने वाला रहा  जब उत्तराखंड  के नैनीताल उच्च  न्यायलय  ने  भारत  की  सनातनी  आस्था  से जुड़ीं प्रसिद्द  नदियों  गंगा-यमुना के साथ  इनमें मिलने वाली अन्य सहायक  नदियों को  इंसानी  क़ानूनी  हक़  देते  हुए अभूतपूर्व  आदेश दिया।  भारत  में  ऐसा क़ानूनी  आदेश  पहला  क़दम  है  जिसे  न्यायमूर्ति आलोक  सिंह  व  न्यायमूर्ति  राजीव  शर्मा  की खंडपीठ  ने  हरिद्वार  निवासी  मियाँ मोहम्मद  सलीम द्वारा  दायर  की गयी  जनहित  याचिका के निबटारे  के वक़्त दिया।

        भारत  में सनातनी  श्रद्धालु गंगा - यमुना  को देवी  के रूप में पूजते  हैं।  वैदिक-साहित्य में इनका स्पष्ट उल्लेख मिलता है।  वेदों में इन नदियों का ज़िक्र  है।  यमुना को वेदों में  यमी ( मृत्यु  के देवता यमराज  की जुड़वां बहन ) और कालिंदी ( श्रीकृष्ण  की 8  पटरानियों में से एक ) के  नाम से  स्थान  प्राप्त  है।  गंगा  की कथा  में  उसके देवलोक से  पृथ्वी  पर  उतरने  तक के वृहद्  वृत्तान्त  हैं। राजा भगीरथ  के  अथक  प्रयासों  से गंगावतरण  की कथा  रोचक है।  त्रिदेवों का  गंगा  से जुड़ाव  होने की  वैदिक - कथाएं  भारतीय जनमानस (  विशेषकर हिंदुओं ) को गंगा  के प्रति  घोर  आस्थावान  बनाती  हैं।  गंगा जल से लेकर गंगा-स्नान  तक सभी भारतीय संस्कृति  की पहचान  से लिपटे  हुए हैं।

             नैनीताल उच्च  न्यायालय  ने 8  सप्ताह  के भीतर  गंगा प्रबंधन  बोर्ड  के गठन  का आदेश  केंद्र  सरकार को दिया है।   गंगा -यमुना  की ओर  से  न्यायालयों  में वाद  दायर  करने  के अधिकार  नमामि  गंगे  प्राधिकरण ,मुख्य  सचिव और महाधिवक्ता  को दिए  गए हैं.  वहीं  दूसरी ओर   कोई  पीड़ित व्यक्ति  भी  इन नदियों  के  विरुद्ध  इनके द्वारा  पहुँचाये   गए   नुकसान  की भरपाई  के लिए  वाद  दायर  कर सकेगा।  उदाहरण  के तौर यदि  किसी  किसान का खेत  इन  नदियों  के  कारण उजड़  जाता  है या उसमें  नदी  की गन्दगी  आ जाती  है तो उसे इनके  विरुद्ध  मामला  दायर करने का अधिकार  होगा।   वहीं  इन नदियों  को प्रदूषित  करने ( कूड़ा -कचरा  आदि  फेकने ) , इन नदियों की तयशुदा  सीमा  के दायरे  में किसी भी प्रकार का अतिक्रमण  होने , इन नदियों में जल कम  होने  आदि पर  सम्बंधित  अधिकारियों की  ओर  से  दोषी  के विरुद्ध  सिविल  कोर्ट  या अन्य न्यायालयों  में मामला  दायर  किया जा सकेगा।

           अभी इन नदियों  में प्रदूषण  के  मुख्य कारण  हैं - शहरों के गंदे  नालों का इन नदियों में मिलना, इनके किनारों पर बने  होटल ,आश्रम ,व्यावसायिक प्रतिष्ठान आदि  का प्रदूषित  जल  जोकि बिना  किसी  प्रकार  के शुद्धिकरण के सीधा  इन नदियों में मिलाया जा रहा है , कारखानों -उद्योगों का  प्रदूषित  जल  एवं  मलवा  इनमें मिलना , सीवर लाइन ( मल - मूत्र ) को सीधे  इन नदियों  में मिलाना , शहरों  में  घर-घर  से निकला  प्रदूषित  जल  नालियों - नालों  से बहता  हुआ सीधा  इन नदियों में मिलना ,डेरी से लेकर  बूचड़खानों  तक का  गोबर , मांस ,रक्त  आदि, सभी प्रकार  का  कूड़ा-कचरा  डालना , पूजा -सामग्री  को सिराना , मूर्ति -विसर्जन करना ,अनाधिकृत सामूहिक आयोजन, किनारों पर  शौचादि  करना , पशुओं को स्नान  कराना , मुर्दों को बहाना , मुर्दों  और  जलाऊ  लकड़ी  व  कंडों (उपलों) के  जलने से  उत्पन्न  राख को इनमें बहाना , खादर क्षेत्र में  अतिक्रमण  कर  खेती करना , अस्थायी आवास  बनाना , अनेक अंधविश्वासों  से जुड़े  आयोजन आदि।

             पिछले वर्ष  दिल्ली  में 11 -13  मार्च  2016  के बीच  संपन्न  हुए  आर्ट  ऑफ़ लिविंग  फाउंडेशन के आयोजन World Culture Festival  ने  यमुना की  ओर  ध्यान  खींचा  था  जब   एनजीटी ( राष्ट्रीय  हरित  न्यायाधिकरण ) ने  इस  आयोजन  के चलते  श्री श्री  रविशंकर  की संस्था  पर यमुना  के पारिस्थिति -तंत्र (  Eco System) को  नुकसान पहुँचाने  व  प्रदूषण  फैलाने  के  कारण  5  करोड़  का अर्थदंड  बसूला  था।

             दिल्ली  में  यमुना  बेहाल  है।  यहां  अतिक्रमण का विकराल  रूप  देखा जा सकता है।  दिल्ली  में यमुना  पर बने पुलों से  लोगों को  कार या दुपहिया  वाहन रोककर  पूजा में उपयोग  हुई सामग्री को पॉलीथिन में  बांधकर  फेकते  हुए  देखा जा सकता  है। यमुना नगर ( हरियाणा) से दिल्ली   आते - आते यमुना  के जल  का बहुतायत  हिस्सा  वज़ीराबाद -बैराज़ पर  दिल्ली  शहर  को  जल आपूर्ति  के उद्देश्य से  रोक  लिया जाता है।  इससे आगे  गंदे  नालों  और सीवर  लाइन  का  प्रदूषित  जल ( प्रदूषित  जल को शुद्ध  करने वाले  प्लांट  भी स्थापित हुए हैं दिल्ली में ) यमुना नदी को ज़िंदा  रखता  है।

            हिमालय  में यमुनोत्री ( ज़िला उत्तरकाशी  उत्तराखंड ) से निकलकर   हिमाचल प्रदेश की सीमाओं से गुज़रती  हुई  उत्तराखंड ,हरियाणा , उत्तर प्रदेश की सीमाएं  छूती  हुई बागपत ,यमुना नगर से  दिल्ली  शहर  में प्रवेश  करती  है यमुना। हिमाचल प्रदेश से आयी टोन्स  नदी  देहरादून  के निकट  कलसी  पर यमुना में मिलती  है आगे  उत्तराखंड की गिरी  नदी भी यमुना में मिलती  है।  दिल्ली से बहार निकलते हुए  ग्रेटर  नोएडा  में  सहारनपुर  से आयी  हिंडन  नदी भी यमुना में मिलकर इसके बहाव को  समृद्धि  प्रदान करती है।  आगरा से आगे रिठाई  के पास राजस्थान से आयी उत्तांगन  नदी  यमुना में मिल जाती है।  अलीगढ़  से आयी सेंगर  नदी भी कालपी  हमीरपुर  के बीच  यमुना में बायीं  ओर  से  मिल जाती है।
       
             यमुना  नदी  में गन्दगी  की  मात्रा  में  दिल्ली  व  इससे  आगे के शहर / कस्बे  इज़ाफ़ा  करते हैं. दिल्ली से  फ़रीदाबाद  ,वृंदावन ,मथुरा ,आगरा ,फ़िरोज़ाबाद ,बटेश्वर ,इटावा  की  गन्दगी समाहित करती हुई यमुना आगे बढ़ती  है. इससे  आगे इटावा  ज़िले की  चकरनगर तहसील के गाँव  मितरौल , कछपुरा , डिभौली ,डिलौली कछार ( डिलौली  बाबा का स्थान ),इकनौर , रनियां ,खिरीटी , गुहानी  होते हुए  भरेह गाँव  तक  पहुंचती  है जहाँ यमुना  में चम्बल  नदी  आकर  मिलती है।  यहां  से चम्बल  का नाम  समाप्त हो जाता है।  आगे  बढ़ते हुए  यमुना नदी  इटावा - जालौन ज़िलों  की सीमाओं  पर  स्थित सांस्कृतिक - ऐतिहासिक स्थल पंचनदा (पचनदा= पांच  नदियों का संगम ) कालेश्वर  मंदिर बिठौली ( इटावा)  और दूसरी ओर  बाबा साहब का मंदिर   कंजौसा( जालौन )  गाँव पर   तीन  नदियों ( सिंध,पहूज, क्वारी ) की  धारा जोकि  कुछ ही दूरी  पर  आपस  में मिलती हैं( सिंध -पहूज नदियाँ   सुल्तानपुरा ,जाएघा ,बिलौंड  के पास  मिलती  हैं  और आगे भिटौरा  पर क्वारी  नदी भी मिल जाती  है ) को  अपने  में समाहित  कर  लेती है। अब  आगे  बढ़ती  है  यमुना  के नाम  से एक बड़ी  नदी। यहाँ  बने  पुल   पर  खड़े  होकर  उत्तर -पूर्व  की ओर  से  आती हुई  यमुना ( चम्बल -यमुना की धारा  ) और  दक्षिण-पश्चिम की ओर  से आती हुई सिंध ( सिंध ,पहूज ,क्वारी ) की  धारा  जब आपस  में यहां  मिलती है तो  तीसरी  धारा  दक्षिण  की ओर  यमुना  के नाम से  बढ़ती  है  जो आगे  मोड़  लेकर  ततारपुर के निकट पूर्व  दिशा  की ओर   हिम्मतपुर , जुहीखा    होते हुए औरैया  ज़िले  की ओर  बढ़ती  है।

            पंचनदा  अब एक सांस्कृतिक  विरासत  का केंद्र  है  जोकि  सरकारी  उपेक्षा  का शिकार  है. यहां  बाबा  साहब का मंदिर  प्राचीन समय से श्रद्धा  का केंद्र  बना हुआ है। यहां  कार्तिक मास  की पूर्णिमा  को  विशाल  मेले का आयोजन  होता है।   यह स्थान  जगम्मनपुर  रियासत  के इतिहास से जुड़ा हुआ है। यहाँ  का मनोहारी  दृश्य  फिल्मकारों  को अपनी ओर   खींच  सकता  है लेकिन  डाकू -समस्या  से पीड़ित  रहा यह  क्षेत्र  कुख्यात  है  इसीलिए  यहां  पर्यटन  की संभावनाओं को सरकारों ने नज़रअंदाज़ कर दिया है। यमुना  पंचनदा  से आगे  जुहीखा , हिम्मतपुर , गुढ़ा ,महतौली  होते  हुए  औरैया  के शेरगढ़ से आगे बढ़ते हुए  कालपी की ओर  बढ़ती  है।   हमीरपुर से आगे सामुही  के पास  बेतवा  नदी  यमुना  में मिल जाती है  आगे  बांदा -फतेहपुर  के बीच  मदनपुर  चिल्ला- घाट   पर  केन  नदी  भी  यमुना  में मिल जाती  है।  अंत  में   प्रयाग में संगम पर  यमुनोत्री से इलाहबाद  तक के 1376  किमी  के सफ़र  को  समाप्त  करते  हुए यमुना (जमुना) नदी गंगा  में मिलकर अपना अस्तित्व खो देती  है। इलाहाबाद  किले से  त्रिवेणी ( तीन  जल धाराएं एक  ओर  से गंगा  दूसरी ओर  से  यमुना यहां मिलकर  नयी (तीसरी)  जलधारा  गंगा  नदी  के रूप  में वाराणसी  की ओर  बढ़ती  है।

गंगोत्री (गोमुख) से निकलकर  बंगाल की खाड़ी (समुद्र) तक  लगभग 2500  किमी का  सफ़र  तय करती  हुई गंगा इसके किनारे  बसे  शहरों ऋषिकेश ,हरिद्वार ,फ़र्रुख़ाबाद , बिठूर ,कानपुर , इलाहबाद ,मिर्ज़ापुर , वाराणसी ,बलिया ,रायबरेली , गाज़ीपुर , हाज़ीपुर ,पटना, बक्सर ,भागलपुर ,मुंगेर  होती हुई पश्चिम बंगाल के रास्ते  बांग्लादेश होती हुई समुद्र तक पहुँचती  है।

गंगा  में प्रदूषण  की  बड़ी शुरुआत कानपुर  शहर  करता है. कानपुर   से पहले बिठूर  में गंगा  का इतना बुरा हाल नहीं है जितना कि  कानपुर  से आगे  हो जाता है।  शहर  की गन्दगी से लेकर कारख़ानों  का समस्त प्रकार  का बिषैला रासायनिक उत्पाद तक  गंगा  में बहा दिया जाता है।  आगे  बड़े शहर  इलाहबाद ,वाराणसी और पटना  भी अपना-अपना योगदान करते हैं. सांस्कृतिक महत्त्व के शहर  गंगा के किनारों पर बसे  हैं  लेकिन  नदियों के प्रति  सिर्फ सरकारी  दिखावा ही नज़र  आता  है वास्तविक  प्रयास शायद  अब शुरू  हो पाएं क्योंकि  न्यायालय   के आदेश की अवहेलना  कर पाना  अब सरकारों को भारी  पड़ने वाला है।

         इन नदियों के  संरक्षण  के लिए अरबों रुपये  बहाये  जा चुके हैं और  इनके संरक्षण के नाम पर  धन का बहाया जाना  अब भी ज़ारी है।  केन्द्रीय  प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड , केन्द्रीय  जल आयोग , केंद्र  सरकार  का पर्यावरण  एवं वन  मंत्रालय , नमामि -गंगे  प्राधिकरण  आदि  सरकारी  खानापूर्ति  के रूप में कार्यरत हैं।  भारत सरकार  2002  में राष्ट्रीय  जल नीति  की घोषणा कर चुकी  है वहीँ  पर्यावरण संरक्षण  एक्ट 1986  लागू है।  न्यायालय  का दख़ल  इन नदियों  के  दिनोंदिन होते   बदतर   हालात  पर  सामने आता रहता है। गंगा  बचाओ  आंदोलन , यमुना बचाओ  आंदोलन  भी  अपनी-अपनी रफ़्तार  से  चलते  आ रहे हैं।  राजनीति  चुनावों  के मौसम  में इन नदियों  की सबसे  बड़ी  हितैषी  बनकर  उभरती है  और  नदियों  के प्रति  आस्था  और विश्वासों  से जुड़े  भावनात्मक   मुद्दों  को   बड़ी चतुराई  से जनता के बीच  पेश करती है, तब ऐसा लगता  है कि  अगले ही क्षण  सब कुछ जादुई  ढंग  से बदल जाने वाला है।  देश  की जनता को जागरूक  होकर  जीवनदायिनी  नदियों के प्रति  अपने कर्तव्यों  का पालन  करना होगा  तभी सार्थक परिणामों की उम्मीद फलीभूत होगी।

दुनिया में  पहली बार  न्यूज़ीलैंड की एक नदी Whanganui को  जीवित  व्यक्ति के कानूनी हक़  देने का समाचार सितंबर  2012  में आया था।  भारत  में  सनातनी श्रद्धालुओं ( हिंदुओं) की आस्था  से जुड़ीं  नदियों को  जीवित व्यक्ति के अधिकार  दिलाने  वाले  मियाँ  मोहम्मद  सलीम के प्रयासों की  सराहना  होनी चाहिए  जिन्होंने  गंगा -जमुनी  तहज़ीब का अनूठा  उदाहरण  पेश किया  है  जबकि  भारत में हिन्दू-मुस्लिम एकता  की जड़ें  खोदने के राजनैतिक  प्रयास अपने चरम  पर हैं।  
                                                                                    - रवीन्द्र सिंह यादव

रविवार, 12 मार्च 2017

मंगलवार, 7 मार्च 2017

सिर्फ़ एक दिन नारी का सम्मान, शेष दिन ........ ?




8  मार्च  अंतर्राष्ट्रीय  महिला  दिवस 


मही अर्थात धरती , जिसे हिला कर रख  दे  वह  है  महिला।   8  मार्च   संयुक्त  राष्ट्र  संघ   द्वारा महिलाओं के सम्मान  को  समर्पित  दिन  है जिसके आसपास  के  दिन भी  नारी - अस्मिता  के उल्लेखों से सराबोर  रहते हैं. विश्व पटल  पर  नारी  की  सामाजिक, आर्थिक  और राजनैतिक  दशा  और  उपलब्धियों  के  बख़ान  का यह दिन  गुज़र  जाता है कुछ  विचारोत्तेजक ,सारगर्भित  चर्चाओं  और प्रकाशनों के साथ।

वर्ष  के शेष   दिन.....?


संघर्ष     के    दिन ,


अपमान   के   दिन ,


उत्पीडन    के     दिन ,


अंतहीन  पीड़ा  के दिन ,



ख़ुशी और ग़म  के   दिन ,


सजाकर  पेश करने के दिन ,


प्रताड़ना   और  तानों  के  दिन,


गौरव   /  अभिमान   के     दिन ,


त्याग  और  समर्पण    के    दिन ,



प्रतिबन्ध   और  वर्जनाओं  के  दिन ,


मन   मारकर    रह   जाने   के   दिन ,


पुरुष-सत्ता  के  क्षोभ  सह  लेने  के  दिन ,


समाज    की   दोगली   सोच      के    दिन ,



कामुकता से उफनते पुरुष की कुदृष्टि  के  दिन,


भोग्या  की  नियति  होकर  मर-मर कर  जीने  के  दिन,


माँ,   बहन ,  भार्या ,   बेटी     होने    के     दिन ,



समाज  के  क़ानून   को  ढोने   के दिन,


दिन  पर   दिन ......364   दिन ,


नारी -सम्मान  का  स्मरण ,


फिर  8  मार्च  के  दिन,


सिर्फ़  एक  दिन... ?


नारी  के सम्मान  में  स्थापित  विचार -

यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवतः,

 ”जननी जन्म भूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी”,

‘मातृदेवो भवः’ ,

पुरातन  काल से  अब तक नारी-संघर्ष की  गाथा  अनेक आयामों से भरी हुई है।  हिंसा  और लूटपाट का दौर  थमा  तो  समाज  ने व्यवस्थित  जीवन  के लिए  नियमावली  तैयार की  और दुनिया में  महिला अधिकारों के साथ  क़ानून  अस्तित्व  में आये  फिर भी दुनिया में  स्त्रियों के लिए  सभी देशों  में समान  अधिकार नहीं  हैं। कहीं  नारी  स्वतंत्रता का ऐसा  बोलबाला है कि  स्त्रियां  पुरुषों  के उत्पीड़न  का कारण  तक बन गयीं हैं तो कहीं ऐसी  स्थिति  भी सामने आयी  कि  महिलाओं  को मतदान  तक का अधिकार  नहीं दिया गया।  महिला-पुरुष मज़दूरी  तक में भेदभाव  रखा गया। 

स्त्रियों पर जबरन अपनी सोच थोपता  रहा समाज  आज  उनके जाग्रत  होते जाने  से  उथल-पुथल  के दौर से गुज़र रहा है। कोई  स्त्री  के वस्त्र धारण  करने के तौर - तरीकों पर अपनी कुंठा  बघार  रहा है तो कोई  स्त्री  को रात  में घर  से बाहर न निकलने  की  सलाह दे रहा है लेकिन  उन वहशी  दरिंदों  को कोई  कुछ  नहीं कहता जो किसी  न किसी  घर  के बेटे  हैं जो  स्त्री  की गरिमा  को  धूल  में मिलाने में  ज़रा  भी शर्म  नहीं करते।

कोई धार्मिक -ग्रंथों  की व्याख्या  को अपनी संकुचित  सोच का  जामा  पहनाकर  पेश कर रहा है तो कोई नारी-स्वतंत्रता एवं  बराबरी  के हक़  के लिए  आनदोलनरत  है। महिला -उत्पीड़न  के समाचारों  का ग्राफ़  नई  ऊँचाइयाँ  छू  रहा है क्योंकि  उद्दंड  युवा  पीढ़ी  स्त्रियों  के  प्रति  नफ़रत  और  कलुषित  भाव  से भर  गयी  है। परिवारों के बिखरने  का सिलसिला  रफ़्तार  पकड़ रहा है।

ग़रीब  स्त्री  आज भी समाज के अनेक प्रकार के शोषण  और अत्याचार  का शिकार बनी  हुई है।   समाज का चतुर-चालाक  तबका  अंधविश्वास और अशिक्षा  का भरपूर  लाभ उठा रहा है। केरल  के  एक पादरी  का बयान  कि  जीन्स  पहनने वाली  महिलाओं  को  समुद्र  में  फिकवा  देना चाहिए , नगालैंड   में महिला  आरक्षण  का पुरुषों द्वारा  तीव्र  विरोध , 3  तलाक़  पर भारत में छिड़ी  बहस , सिनेमा  में  स्त्री  को किस रूप में पेश  किया जाय इस मुद्दे पर  बहस  ज़ारी  है।

भारत में  महिला उत्पीड़न  को  रोकने  के लिए 16  दिसंबर  2012  की रात  दिल्ली  में घटित  निर्भया - काण्ड  के बाद हुए आंदोलन के उपरान्त   सर्वोच्च  न्यायलय  के  अवकाश प्राप्त  न्यायाधीश जस्टिस  जे.  एस.  वर्मा ( अब स्वर्गीय)  की अध्यक्षता  में बने  तीन  सदस्यीय आयोग ने  बेहद  सख़्त  क़ानून  का ख़ाका  पेश किया जिसे भारत सरकार ने 3  अप्रैल 2013  से  लागू कर दिया  फिर भी सरकारी  मशीनरी  उस क़ानून  को  लागू कर पाने में भ्रष्टाचार और राजनैतिक दखल के चलते  असफल  होती चली आ रही है  जिसमें  महिलाओं  को घूरने, पीछा  करने , बिना  सहमति  के  शरीर  को हाथ  लगाने ,इंटरनेट  पर महिलाओं की जासूसी करने  आदि तक  को  ( तब तक  उपेक्षित  मांगों )   भी शामिल किया गया है।

नारी को  समाज  में प्रतिष्ठा  और अधिकारों  के लिए  अभी लंबा  संघर्ष  करना है।  शिक्षा  एक ऐसा हथियार  है जो स्त्री  को उसके  वांछनीय  गौरव  को  हासिल होने  में सहायक सिद्ध  हुआ है।  आज हम देखते  हैं कि  निजी क्षेत्र  में  स्त्रियों  को बढ़ावा  दिया  जा रहा है  उसके पीछे  भी  समाज   की उदारता  नहीं बल्कि  कायरता  छुपी है  क्योंकि  वह  जानता  है कि  स्त्री  कानूनों  के चलते  उनके कार्यस्थल  सुरक्षित  रहेंगे  और  स्त्रियों  के प्रति दया  भाव  और  उनका आकर्षण  उनकी   व्यावसायिक  सफलता  का हेतु  बनता है।

स्त्रियों  से आह्वान किया जाता है  कि  अब  जागो , ख़ुद  को बुलंद  करो ,अपना मार्ग प्रशस्त  करो  जिससे फिर कोई महाकवियत्री महादेवी  बनकर  न लिख  दे  " मैं  नीर  भरी दुःख की बदली "


आज अंतर्राष्ट्रीय महिला  दिवस  पर  महिलाओं  को मेरा नमन।

भारत  में ग्रामीण क्षेत्रों में  महिलाओं  की स्थिति  का  एक उदाहरण  मैं  अपनी  यू  ट्यूब  पर प्रस्तुति " ज़िन्दगी  का  सफ़र  पगडंडियों पर " के मार्फ़त  प्रस्तुत कर रहा हूँ  जिसमें एक विधवा  पिछले 22  वर्षों से  विधवा -पेंशन के लिए संघर्षरत  है।  14  मिनट  8  सेकण्ड  का समय  देना ज़रूरी  है  यह जानने  के लिए  कि  जिनके  पास शब्द और साधन  नहीं हैं उन महिलाओं  पर क्या  बीतती  है जीवनभर......
जिसका लिंक है -
https://youtu.be/Nbxufhttps:/hMHgDQ

                                                                              - रवीन्द्र  सिंह  यादव



शुक्रवार, 3 मार्च 2017

सोशल -मीडिया कितना सोशल रह गया है ?



सोशल -मीडिया  कितना  सोशल  रह  गया  है ? यह सवाल अब हमारे  ज़हन  में बार-बार  कौंधने लगा  है। आजकल  फेसबुक , ट्विटर , यू  ट्यूब , इंस्टाग्राम ,लिंक्ड इन ,पिनटेरेस्ट ,गूगल प्लस ,आदि  लोकप्रिय नेट्वर्किंग साइट  हैं.  अब   ब्लॉगर और ऑनलाइन  अख़बार  भी  सोशल मीडिया  का प्रतिनिधित्व  करते नज़र आते  हैं।  

      युवाओं  के  बीच  फेसबुक  सर्वाधिक  लोकप्रिय  सोशल मीडिया साइट है। इस  साइट  के साथ अनेक विवाद भी जुड़  गए हैं.  विडियो  के लिए  यू  ट्यूब अग्रणी  साइट है। जिस पर  अति  उत्साही  लोग अनेक प्रकार की आपत्तिजनक सामग्री  को भी अपलोड कर देते  हैं।  यह सिलसिला  अब भयावह  रूप लेता जा रहा है. आप देखना कुछ और चाहते  लेकिन विडियो  के पार्श्व  में अनेक प्रकार की  आपत्तिजनक / वयस्क सामग्री  को देखने की अनुशंसा प्रकट हो जाती है। यदि  आप अपना विडियो  किसी को इस साइट पर देखने के लिए अनुरोध भेजते हैं तो बदले में उसे आपके विडियो  के साथ  अनावश्यक सामग्री  की झलक भी दिखाई जाती है जिससे देखने वाला अपना मार्ग भटककर इनके बनाये हुए जाल में फंसकर  विज्ञापनों की दुनिया का शिकार हो जाय। 

      हाल  ही में  भारत  की  सर्वोच्च  अदालत  में यू ट्यूब  विडियोज़  में  आपत्तिजनक  सामग्री जोकि  व्यक्ति विशेष के  चरित्र  को  तय मक़सद से अत्याधुनिक  तकनीक  से  तैयार कर बदनाम करने की नियत से           (भले  ही  सम्बंधित व्यक्ति का उससे कोई सम्बन्ध न हो ) प्रकाशित  और प्रसारित  किया  जा रहा है  पर  बहस हुई  जिसमें  यू ट्यूब  का जवाब  हमें  असहाय  होकर  बदनामी  झेलने  पर  मज़बूर  कर देने वाला  है.  इस साइट  का कहना  है  कि  रोज़ाना  इतने वीडियो  अपलोड  होते हैं कि  उन सबकी जांच के लिए उसे 5  लाख   कर्मचारी   नियुक्त  करने होंगे जोकि उसके लिए संभव नहीं है।  

    हाल ही में भारत  में एक फेसबुक  पोस्ट ज्वलंत  मुद्दा  बन गयी  जोकि  विगत 22  फरवरी 2017 को दिल्ली के एक महाविद्यालय  में दो विश्वविद्यालयों   के छात्रों व  शिक्षकों  के बीच  अभिव्यक्ति  की आज़ादी  को लेकर हुए  टकराव  में हिंसा से  व्यथित  कारगिल  शहीद  की बेटी  ने  एक छात्र  संगठन की  उपद्रवी गतिविधयों को कठघरे  में खड़ा किया।  उस युवती  को जवाब में अश्लील  गालियों की बौछार  का सामना करना पड़ा साथ ही  गैंगरेप  की खुली ऑनलाइन  धमकी  भी मिली।  लोगों ने ऐसा महसूस किया  जैसे  क़ानून अब  असहाय  हो चुका  है। इसके विरुद्ध जब  उस  युवती  के पक्ष में  प्रबुद्ध  लोग खड़े हुए  और  लेखन सक्रियता  बढ़ी  तब  इस धमकी  और अश्लील गालियों  के  विरुद्ध दिल्ली  पुलिस ने प्रथम सूचना रिपोर्ट  दर्ज़ की  है. दिल्ली महिला आयोग ने भी फेसबुक  से  सम्बंधित आपत्तिजनक  पोस्ट  लिखने वाले की पहचान  बताने के लिए पत्र  लिखा है। 
    
      उस  पोस्ट  के कुछ शब्दों  को छुपाकर शेष  शब्द  कुछ ऑनलाइन  अखबारों में छपे  जोकि  घोर निंदनीयऔर असहज  स्थिति पैदा  करने वाले हैं।  एक खिलाड़ी ने  उस युवती  के एक साल पहले के विडियो पोस्टर  का  मज़ाक  बना डाला जिसमें  लिखा था कि  "मेरे पिता को पाकिस्तान  ने नहीं युद्ध ने मारा  है ", एक बेटी जो अपने पिता को  2  वर्ष की उम्र में कारगिल -युद्ध (मई -जुलाई 1999 ) में  देश के लिए कुर्बान  हो जाने पर  दो देशों के बीच  अमन  का सन्देश  देने की सार्थक कोशिश करती है  उसकी कोमल भावनाओं को कुछ लोग देशद्रोह से जोड़  देते हैं तब बदले  में कुछ खिलाडी, लेखक, पत्रकार , कलाकार , बुद्धजीवी  वर्ग और मीडिया का एक वर्ग उसके  अदम्य  साहस  को संबल  देने उसके साथ खड़े  नज़र  आते हैं।  अंतरराष्ट्रीय मीडिया  भी देश में इस मुद्दे पर फैलाये जा रहे  भ्रम पर  टिप्पणियां  करता  है। इस मुद्दे पर अभी भी बहस गर्म है।  देश में चुनावी माहौल  है। ज़रूरी  है कि  हम सोशल मीडिया  की अच्छाइयाँ  और बुराइयाँ भलीभांति समझें और  बच्चों  की उत्सुकता  को सही दिखा में मोड़ें.  इंटरनेट  पर असामाजिक   तत्वों की पहचान को सुलभ बनाया  जाय  और संयुक्त  राष्ट्र संघ  में ऐसा  कानून  बने जोकि  सब देशों पर लागू  हो जिससे इंटरनेट पर आपराधिक  तत्वों  की कुंठा  को नियंत्रित  किया जा सके। यह मुद्दा  आपके समक्ष  बहस के लिए पेश किया जा रहा है। 

    नवभारत टाइम्स डॉट कॉम  के संपादक श्री  नीरेंद्र  नागर  के ब्लॉग  एकला  चलो के  ब्लॉग शीर्षक "

भेड़िये ने मेमने से कहा- तुमने देश को गाली क्यों दी?"

पर  मेरी  टिपण्णी - 
Ravindra Singh Yadav19926
•New Delhi
आपका व्यंग आग में घी डालने आ गया है. ज़रूरी है जब विचारधारा की लड़ाई श्रेष्ठता को लेकर हो तब क़लम ख़ामोश न बैठी रहे. अब समाचार आ गया है कि राष् ट्रीय मानवाधिकार आयोग भी इस मामले में सक्रिय हो गया है उसने दिल्ली पुलिस( जोकि पूरी तरह एक राजनैतिक समूह बन चुकी है) से 22 फरवरी 2017 की रामजस कॉलेज की उपद्रवी घटना पर जवाब मांगा है. 22 फरवरी 2017 को घटना घटती है और 28 फरवरी 2017 को राष् ट्रीय मानवाधिकार आयोग की आंख खुलती है वह भी तब जबकि उससे लिखित शिकायत की जाती है. बड़े ही अफसोस की बात है कि देश में व्यवस्था के नाम पर अराजकता का बोलबाला होता जा रहा है. एक महिला की गरिमा को समूचे भूमंडल पर तार-तार कर देने वाले कुंठित मानसिकता से भरे ग्लोबल रायटर्स के विचार अब दुनियाभर में चर्चा का बिषय हैं. इन्टरनेट पर मिली लिखने की आज़ादी को लोग इस तरह उपयोग करेंगे जिस तरह दो लुच्चों-लफ़ंगों के बीच अश्लील वार्तालाप होती है. वे नहीं जानते कि उन्हें जिस बोतलिंग-प्लांट में वैचारिक दरिद्रता की घुट्टी भर कर पैक करके बाज़ार में उतारा जा रहा है वह ख़ुद उनके लिये,परिवार के लिये,समाज के लिये,देश के लिये और दुनिया के लिये कितना घातक है. राजनैतिक निष्ठा से आप्लावित दिशाहीन युवा स्वयं को चर्चित कर किसी न किसी लाभ का आकांक्षी है और वह सोचता है कि वह जिस विचारधारा का हिमायती है वह ही अंतिम सत्य है. यही विचार फ़ासीवाद और तानाशाही का जनक है. माननीय सर्वोच्च न्यायालय से अपील है कि सरकार को स्पष्ट निर्देश दे कि महिला सुरक्षा के नाम पर बनाये गये सख्त कानून (2013) का सख्ती से पालन करे और राजनैतिक निष्ठा की ग़ुलाम होती जा रही नैकारशाही को जनता के प्रति जवाबदेह और संवेदनशील होने का स्पष्ट निर्देश ज़ारी हो ताकि सरेआम महिलाओं के बारे में अपनी कुंठा बघारने वालों की गर्दन कानून के हाथ में आ सके.
5 2 जवाब देंशिकायत क


                                                                                                     - रवीन्द्र  सिंह  यादव