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शुक्रवार, 3 मार्च 2017

सोशल -मीडिया कितना सोशल रह गया है ?



सोशल -मीडिया  कितना  सोशल  रह  गया  है ? यह सवाल अब हमारे  ज़हन  में बार-बार  कौंधने लगा  है। आजकल  फेसबुक , ट्विटर , यू  ट्यूब , इंस्टाग्राम ,लिंक्ड इन ,पिनटेरेस्ट ,गूगल प्लस ,आदि  लोकप्रिय नेट्वर्किंग साइट  हैं.  अब   ब्लॉगर और ऑनलाइन  अख़बार  भी  सोशल मीडिया  का प्रतिनिधित्व  करते नज़र आते  हैं।  

      युवाओं  के  बीच  फेसबुक  सर्वाधिक  लोकप्रिय  सोशल मीडिया साइट है। इस  साइट  के साथ अनेक विवाद भी जुड़  गए हैं.  विडियो  के लिए  यू  ट्यूब अग्रणी  साइट है। जिस पर  अति  उत्साही  लोग अनेक प्रकार की आपत्तिजनक सामग्री  को भी अपलोड कर देते  हैं।  यह सिलसिला  अब भयावह  रूप लेता जा रहा है. आप देखना कुछ और चाहते  लेकिन विडियो  के पार्श्व  में अनेक प्रकार की  आपत्तिजनक / वयस्क सामग्री  को देखने की अनुशंसा प्रकट हो जाती है। यदि  आप अपना विडियो  किसी को इस साइट पर देखने के लिए अनुरोध भेजते हैं तो बदले में उसे आपके विडियो  के साथ  अनावश्यक सामग्री  की झलक भी दिखाई जाती है जिससे देखने वाला अपना मार्ग भटककर इनके बनाये हुए जाल में फंसकर  विज्ञापनों की दुनिया का शिकार हो जाय। 

      हाल  ही में  भारत  की  सर्वोच्च  अदालत  में यू ट्यूब  विडियोज़  में  आपत्तिजनक  सामग्री जोकि  व्यक्ति विशेष के  चरित्र  को  तय मक़सद से अत्याधुनिक  तकनीक  से  तैयार कर बदनाम करने की नियत से           (भले  ही  सम्बंधित व्यक्ति का उससे कोई सम्बन्ध न हो ) प्रकाशित  और प्रसारित  किया  जा रहा है  पर  बहस हुई  जिसमें  यू ट्यूब  का जवाब  हमें  असहाय  होकर  बदनामी  झेलने  पर  मज़बूर  कर देने वाला  है.  इस साइट  का कहना  है  कि  रोज़ाना  इतने वीडियो  अपलोड  होते हैं कि  उन सबकी जांच के लिए उसे 5  लाख   कर्मचारी   नियुक्त  करने होंगे जोकि उसके लिए संभव नहीं है।  

    हाल ही में भारत  में एक फेसबुक  पोस्ट ज्वलंत  मुद्दा  बन गयी  जोकि  विगत 22  फरवरी 2017 को दिल्ली के एक महाविद्यालय  में दो विश्वविद्यालयों   के छात्रों व  शिक्षकों  के बीच  अभिव्यक्ति  की आज़ादी  को लेकर हुए  टकराव  में हिंसा से  व्यथित  कारगिल  शहीद  की बेटी  ने  एक छात्र  संगठन की  उपद्रवी गतिविधयों को कठघरे  में खड़ा किया।  उस युवती  को जवाब में अश्लील  गालियों की बौछार  का सामना करना पड़ा साथ ही  गैंगरेप  की खुली ऑनलाइन  धमकी  भी मिली।  लोगों ने ऐसा महसूस किया  जैसे  क़ानून अब  असहाय  हो चुका  है। इसके विरुद्ध जब  उस  युवती  के पक्ष में  प्रबुद्ध  लोग खड़े हुए  और  लेखन सक्रियता  बढ़ी  तब  इस धमकी  और अश्लील गालियों  के  विरुद्ध दिल्ली  पुलिस ने प्रथम सूचना रिपोर्ट  दर्ज़ की  है. दिल्ली महिला आयोग ने भी फेसबुक  से  सम्बंधित आपत्तिजनक  पोस्ट  लिखने वाले की पहचान  बताने के लिए पत्र  लिखा है। 
    
      उस  पोस्ट  के कुछ शब्दों  को छुपाकर शेष  शब्द  कुछ ऑनलाइन  अखबारों में छपे  जोकि  घोर निंदनीयऔर असहज  स्थिति पैदा  करने वाले हैं।  एक खिलाड़ी ने  उस युवती  के एक साल पहले के विडियो पोस्टर  का  मज़ाक  बना डाला जिसमें  लिखा था कि  "मेरे पिता को पाकिस्तान  ने नहीं युद्ध ने मारा  है ", एक बेटी जो अपने पिता को  2  वर्ष की उम्र में कारगिल -युद्ध (मई -जुलाई 1999 ) में  देश के लिए कुर्बान  हो जाने पर  दो देशों के बीच  अमन  का सन्देश  देने की सार्थक कोशिश करती है  उसकी कोमल भावनाओं को कुछ लोग देशद्रोह से जोड़  देते हैं तब बदले  में कुछ खिलाडी, लेखक, पत्रकार , कलाकार , बुद्धजीवी  वर्ग और मीडिया का एक वर्ग उसके  अदम्य  साहस  को संबल  देने उसके साथ खड़े  नज़र  आते हैं।  अंतरराष्ट्रीय मीडिया  भी देश में इस मुद्दे पर फैलाये जा रहे  भ्रम पर  टिप्पणियां  करता  है। इस मुद्दे पर अभी भी बहस गर्म है।  देश में चुनावी माहौल  है। ज़रूरी  है कि  हम सोशल मीडिया  की अच्छाइयाँ  और बुराइयाँ भलीभांति समझें और  बच्चों  की उत्सुकता  को सही दिखा में मोड़ें.  इंटरनेट  पर असामाजिक   तत्वों की पहचान को सुलभ बनाया  जाय  और संयुक्त  राष्ट्र संघ  में ऐसा  कानून  बने जोकि  सब देशों पर लागू  हो जिससे इंटरनेट पर आपराधिक  तत्वों  की कुंठा  को नियंत्रित  किया जा सके। यह मुद्दा  आपके समक्ष  बहस के लिए पेश किया जा रहा है। 

    नवभारत टाइम्स डॉट कॉम  के संपादक श्री  नीरेंद्र  नागर  के ब्लॉग  एकला  चलो के  ब्लॉग शीर्षक "

भेड़िये ने मेमने से कहा- तुमने देश को गाली क्यों दी?"

पर  मेरी  टिपण्णी - 
Ravindra Singh Yadav19926
•New Delhi
आपका व्यंग आग में घी डालने आ गया है. ज़रूरी है जब विचारधारा की लड़ाई श्रेष्ठता को लेकर हो तब क़लम ख़ामोश न बैठी रहे. अब समाचार आ गया है कि राष् ट्रीय मानवाधिकार आयोग भी इस मामले में सक्रिय हो गया है उसने दिल्ली पुलिस( जोकि पूरी तरह एक राजनैतिक समूह बन चुकी है) से 22 फरवरी 2017 की रामजस कॉलेज की उपद्रवी घटना पर जवाब मांगा है. 22 फरवरी 2017 को घटना घटती है और 28 फरवरी 2017 को राष् ट्रीय मानवाधिकार आयोग की आंख खुलती है वह भी तब जबकि उससे लिखित शिकायत की जाती है. बड़े ही अफसोस की बात है कि देश में व्यवस्था के नाम पर अराजकता का बोलबाला होता जा रहा है. एक महिला की गरिमा को समूचे भूमंडल पर तार-तार कर देने वाले कुंठित मानसिकता से भरे ग्लोबल रायटर्स के विचार अब दुनियाभर में चर्चा का बिषय हैं. इन्टरनेट पर मिली लिखने की आज़ादी को लोग इस तरह उपयोग करेंगे जिस तरह दो लुच्चों-लफ़ंगों के बीच अश्लील वार्तालाप होती है. वे नहीं जानते कि उन्हें जिस बोतलिंग-प्लांट में वैचारिक दरिद्रता की घुट्टी भर कर पैक करके बाज़ार में उतारा जा रहा है वह ख़ुद उनके लिये,परिवार के लिये,समाज के लिये,देश के लिये और दुनिया के लिये कितना घातक है. राजनैतिक निष्ठा से आप्लावित दिशाहीन युवा स्वयं को चर्चित कर किसी न किसी लाभ का आकांक्षी है और वह सोचता है कि वह जिस विचारधारा का हिमायती है वह ही अंतिम सत्य है. यही विचार फ़ासीवाद और तानाशाही का जनक है. माननीय सर्वोच्च न्यायालय से अपील है कि सरकार को स्पष्ट निर्देश दे कि महिला सुरक्षा के नाम पर बनाये गये सख्त कानून (2013) का सख्ती से पालन करे और राजनैतिक निष्ठा की ग़ुलाम होती जा रही नैकारशाही को जनता के प्रति जवाबदेह और संवेदनशील होने का स्पष्ट निर्देश ज़ारी हो ताकि सरेआम महिलाओं के बारे में अपनी कुंठा बघारने वालों की गर्दन कानून के हाथ में आ सके.
5 2 जवाब देंशिकायत क


                                                                                                     - रवीन्द्र  सिंह  यादव