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बुधवार, 22 मार्च 2017

गंगा -यमुना को मिला न्याय


एक  मुस्लिम भाई  ने हिंदुओं की आस्था से जुड़ीं गंगा -यमुना को दिलाये  ज़िंदा इंसान   के  हक़....  

 

20  मार्च  2017  का दिन  पर्यावरणवादियों , प्रकृति-प्रेमियों और  भारतीय संस्कृति पर  गर्व  करने वालों के साथ-साथ  नदियों  के प्रति अगाध   श्रद्धा  रखने  वालों  को गदगद  कर  देने वाला रहा  जब उत्तराखंड  के नैनीताल उच्च  न्यायलय  ने  भारत  की  सनातनी  आस्था  से जुड़ीं प्रसिद्द  नदियों  गंगा-यमुना के साथ  इनमें मिलने वाली अन्य सहायक  नदियों को  इंसानी  क़ानूनी  हक़  देते  हुए अभूतपूर्व  आदेश दिया।  भारत  में  ऐसा क़ानूनी  आदेश  पहला  क़दम  है  जिसे  न्यायमूर्ति आलोक  सिंह  व  न्यायमूर्ति  राजीव  शर्मा  की खंडपीठ  ने  हरिद्वार  निवासी  मियाँ मोहम्मद  सलीम द्वारा  दायर  की गयी  जनहित  याचिका के निबटारे  के वक़्त दिया।

        भारत  में सनातनी  श्रद्धालु गंगा - यमुना  को देवी  के रूप में पूजते  हैं।  वैदिक-साहित्य में इनका स्पष्ट उल्लेख मिलता है।  वेदों में इन नदियों का ज़िक्र  है।  यमुना को वेदों में  यमी ( मृत्यु  के देवता यमराज  की जुड़वां बहन ) और कालिंदी ( श्रीकृष्ण  की 8  पटरानियों में से एक ) के  नाम से  स्थान  प्राप्त  है।  गंगा  की कथा  में  उसके देवलोक से  पृथ्वी  पर  उतरने  तक के वृहद्  वृत्तान्त  हैं। राजा भगीरथ  के  अथक  प्रयासों  से गंगावतरण  की कथा  रोचक है।  त्रिदेवों का  गंगा  से जुड़ाव  होने की  वैदिक - कथाएं  भारतीय जनमानस (  विशेषकर हिंदुओं ) को गंगा  के प्रति  घोर  आस्थावान  बनाती  हैं।  गंगा जल से लेकर गंगा-स्नान  तक सभी भारतीय संस्कृति  की पहचान  से लिपटे  हुए हैं।

             नैनीताल उच्च  न्यायालय  ने 8  सप्ताह  के भीतर  गंगा प्रबंधन  बोर्ड  के गठन  का आदेश  केंद्र  सरकार को दिया है।   गंगा -यमुना  की ओर  से  न्यायालयों  में वाद  दायर  करने  के अधिकार  नमामि  गंगे  प्राधिकरण ,मुख्य  सचिव और महाधिवक्ता  को दिए  गए हैं.  वहीं  दूसरी ओर   कोई  पीड़ित व्यक्ति  भी  इन नदियों  के  विरुद्ध  इनके द्वारा  पहुँचाये   गए   नुकसान  की भरपाई  के लिए  वाद  दायर  कर सकेगा।  उदाहरण  के तौर यदि  किसी  किसान का खेत  इन  नदियों  के  कारण उजड़  जाता  है या उसमें  नदी  की गन्दगी  आ जाती  है तो उसे इनके  विरुद्ध  मामला  दायर करने का अधिकार  होगा।   वहीं  इन नदियों  को प्रदूषित  करने ( कूड़ा -कचरा  आदि  फेकने ) , इन नदियों की तयशुदा  सीमा  के दायरे  में किसी भी प्रकार का अतिक्रमण  होने , इन नदियों में जल कम  होने  आदि पर  सम्बंधित  अधिकारियों की  ओर  से  दोषी  के विरुद्ध  सिविल  कोर्ट  या अन्य न्यायालयों  में मामला  दायर  किया जा सकेगा।

           अभी इन नदियों  में प्रदूषण  के  मुख्य कारण  हैं - शहरों के गंदे  नालों का इन नदियों में मिलना, इनके किनारों पर बने  होटल ,आश्रम ,व्यावसायिक प्रतिष्ठान आदि  का प्रदूषित  जल  जोकि बिना  किसी  प्रकार  के शुद्धिकरण के सीधा  इन नदियों में मिलाया जा रहा है , कारखानों -उद्योगों का  प्रदूषित  जल  एवं  मलवा  इनमें मिलना , सीवर लाइन ( मल - मूत्र ) को सीधे  इन नदियों  में मिलाना , शहरों  में  घर-घर  से निकला  प्रदूषित  जल  नालियों - नालों  से बहता  हुआ सीधा  इन नदियों में मिलना ,डेरी से लेकर  बूचड़खानों  तक का  गोबर , मांस ,रक्त  आदि, सभी प्रकार  का  कूड़ा-कचरा  डालना , पूजा -सामग्री  को सिराना , मूर्ति -विसर्जन करना ,अनाधिकृत सामूहिक आयोजन, किनारों पर  शौचादि  करना , पशुओं को स्नान  कराना , मुर्दों को बहाना , मुर्दों  और  जलाऊ  लकड़ी  व  कंडों (उपलों) के  जलने से  उत्पन्न  राख को इनमें बहाना , खादर क्षेत्र में  अतिक्रमण  कर  खेती करना , अस्थायी आवास  बनाना , अनेक अंधविश्वासों  से जुड़े  आयोजन आदि।

             पिछले वर्ष  दिल्ली  में 11 -13  मार्च  2016  के बीच  संपन्न  हुए  आर्ट  ऑफ़ लिविंग  फाउंडेशन के आयोजन World Culture Festival  ने  यमुना की  ओर  ध्यान  खींचा  था  जब   एनजीटी ( राष्ट्रीय  हरित  न्यायाधिकरण ) ने  इस  आयोजन  के चलते  श्री श्री  रविशंकर  की संस्था  पर यमुना  के पारिस्थिति -तंत्र (  Eco System) को  नुकसान पहुँचाने  व  प्रदूषण  फैलाने  के  कारण  5  करोड़  का अर्थदंड  बसूला  था।

             दिल्ली  में  यमुना  बेहाल  है।  यहां  अतिक्रमण का विकराल  रूप  देखा जा सकता है।  दिल्ली  में यमुना  पर बने पुलों से  लोगों को  कार या दुपहिया  वाहन रोककर  पूजा में उपयोग  हुई सामग्री को पॉलीथिन में  बांधकर  फेकते  हुए  देखा जा सकता  है। यमुना नगर ( हरियाणा) से दिल्ली   आते - आते यमुना  के जल  का बहुतायत  हिस्सा  वज़ीराबाद -बैराज़ पर  दिल्ली  शहर  को  जल आपूर्ति  के उद्देश्य से  रोक  लिया जाता है।  इससे आगे  गंदे  नालों  और सीवर  लाइन  का  प्रदूषित  जल ( प्रदूषित  जल को शुद्ध  करने वाले  प्लांट  भी स्थापित हुए हैं दिल्ली में ) यमुना नदी को ज़िंदा  रखता  है।

            हिमालय  में यमुनोत्री ( ज़िला उत्तरकाशी  उत्तराखंड ) से निकलकर   हिमाचल प्रदेश की सीमाओं से गुज़रती  हुई  उत्तराखंड ,हरियाणा , उत्तर प्रदेश की सीमाएं  छूती  हुई बागपत ,यमुना नगर से  दिल्ली  शहर  में प्रवेश  करती  है यमुना। हिमाचल प्रदेश से आयी टोन्स  नदी  देहरादून  के निकट  कलसी  पर यमुना में मिलती  है आगे  उत्तराखंड की गिरी  नदी भी यमुना में मिलती  है।  दिल्ली से बहार निकलते हुए  ग्रेटर  नोएडा  में  सहारनपुर  से आयी  हिंडन  नदी भी यमुना में मिलकर इसके बहाव को  समृद्धि  प्रदान करती है।  आगरा से आगे रिठाई  के पास राजस्थान से आयी उत्तांगन  नदी  यमुना में मिल जाती है।  अलीगढ़  से आयी सेंगर  नदी भी कालपी  हमीरपुर  के बीच  यमुना में बायीं  ओर  से  मिल जाती है।
       
             यमुना  नदी  में गन्दगी  की  मात्रा  में  दिल्ली  व  इससे  आगे के शहर / कस्बे  इज़ाफ़ा  करते हैं. दिल्ली से  फ़रीदाबाद  ,वृंदावन ,मथुरा ,आगरा ,फ़िरोज़ाबाद ,बटेश्वर ,इटावा  की  गन्दगी समाहित करती हुई यमुना आगे बढ़ती  है. इससे  आगे इटावा  ज़िले की  चकरनगर तहसील के गाँव  मितरौल , कछपुरा , डिभौली ,डिलौली कछार ( डिलौली  बाबा का स्थान ),इकनौर , रनियां ,खिरीटी , गुहानी  होते हुए  भरेह गाँव  तक  पहुंचती  है जहाँ यमुना  में चम्बल  नदी  आकर  मिलती है।  यहां  से चम्बल  का नाम  समाप्त हो जाता है।  आगे  बढ़ते हुए  यमुना नदी  इटावा - जालौन ज़िलों  की सीमाओं  पर  स्थित सांस्कृतिक - ऐतिहासिक स्थल पंचनदा (पचनदा= पांच  नदियों का संगम ) कालेश्वर  मंदिर बिठौली ( इटावा)  और दूसरी ओर  बाबा साहब का मंदिर   कंजौसा( जालौन )  गाँव पर   तीन  नदियों ( सिंध,पहूज, क्वारी ) की  धारा जोकि  कुछ ही दूरी  पर  आपस  में मिलती हैं( सिंध -पहूज नदियाँ   सुल्तानपुरा ,जाएघा ,बिलौंड  के पास  मिलती  हैं  और आगे भिटौरा  पर क्वारी  नदी भी मिल जाती  है ) को  अपने  में समाहित  कर  लेती है। अब  आगे  बढ़ती  है  यमुना  के नाम  से एक बड़ी  नदी। यहाँ  बने  पुल   पर  खड़े  होकर  उत्तर -पूर्व  की ओर  से  आती हुई  यमुना ( चम्बल -यमुना की धारा  ) और  दक्षिण-पश्चिम की ओर  से आती हुई सिंध ( सिंध ,पहूज ,क्वारी ) की  धारा  जब आपस  में यहां  मिलती है तो  तीसरी  धारा  दक्षिण  की ओर  यमुना  के नाम से  बढ़ती  है  जो आगे  मोड़  लेकर  ततारपुर के निकट पूर्व  दिशा  की ओर   हिम्मतपुर , जुहीखा    होते हुए औरैया  ज़िले  की ओर  बढ़ती  है।

            पंचनदा  अब एक सांस्कृतिक  विरासत  का केंद्र  है  जोकि  सरकारी  उपेक्षा  का शिकार  है. यहां  बाबा  साहब का मंदिर  प्राचीन समय से श्रद्धा  का केंद्र  बना हुआ है। यहां  कार्तिक मास  की पूर्णिमा  को  विशाल  मेले का आयोजन  होता है।   यह स्थान  जगम्मनपुर  रियासत  के इतिहास से जुड़ा हुआ है। यहाँ  का मनोहारी  दृश्य  फिल्मकारों  को अपनी ओर   खींच  सकता  है लेकिन  डाकू -समस्या  से पीड़ित  रहा यह  क्षेत्र  कुख्यात  है  इसीलिए  यहां  पर्यटन  की संभावनाओं को सरकारों ने नज़रअंदाज़ कर दिया है। यमुना  पंचनदा  से आगे  जुहीखा , हिम्मतपुर , गुढ़ा ,महतौली  होते  हुए  औरैया  के शेरगढ़ से आगे बढ़ते हुए  कालपी की ओर  बढ़ती  है।   हमीरपुर से आगे सामुही  के पास  बेतवा  नदी  यमुना  में मिल जाती है  आगे  बांदा -फतेहपुर  के बीच  मदनपुर  चिल्ला- घाट   पर  केन  नदी  भी  यमुना  में मिल जाती  है।  अंत  में   प्रयाग में संगम पर  यमुनोत्री से इलाहबाद  तक के 1376  किमी  के सफ़र  को  समाप्त  करते  हुए यमुना (जमुना) नदी गंगा  में मिलकर अपना अस्तित्व खो देती  है। इलाहाबाद  किले से  त्रिवेणी ( तीन  जल धाराएं एक  ओर  से गंगा  दूसरी ओर  से  यमुना यहां मिलकर  नयी (तीसरी)  जलधारा  गंगा  नदी  के रूप  में वाराणसी  की ओर  बढ़ती  है।

गंगोत्री (गोमुख) से निकलकर  बंगाल की खाड़ी (समुद्र) तक  लगभग 2500  किमी का  सफ़र  तय करती  हुई गंगा इसके किनारे  बसे  शहरों ऋषिकेश ,हरिद्वार ,फ़र्रुख़ाबाद , बिठूर ,कानपुर , इलाहबाद ,मिर्ज़ापुर , वाराणसी ,बलिया ,रायबरेली , गाज़ीपुर , हाज़ीपुर ,पटना, बक्सर ,भागलपुर ,मुंगेर  होती हुई पश्चिम बंगाल के रास्ते  बांग्लादेश होती हुई समुद्र तक पहुँचती  है।

गंगा  में प्रदूषण  की  बड़ी शुरुआत कानपुर  शहर  करता है. कानपुर   से पहले बिठूर  में गंगा  का इतना बुरा हाल नहीं है जितना कि  कानपुर  से आगे  हो जाता है।  शहर  की गन्दगी से लेकर कारख़ानों  का समस्त प्रकार  का बिषैला रासायनिक उत्पाद तक  गंगा  में बहा दिया जाता है।  आगे  बड़े शहर  इलाहबाद ,वाराणसी और पटना  भी अपना-अपना योगदान करते हैं. सांस्कृतिक महत्त्व के शहर  गंगा के किनारों पर बसे  हैं  लेकिन  नदियों के प्रति  सिर्फ सरकारी  दिखावा ही नज़र  आता  है वास्तविक  प्रयास शायद  अब शुरू  हो पाएं क्योंकि  न्यायालय   के आदेश की अवहेलना  कर पाना  अब सरकारों को भारी  पड़ने वाला है।

         इन नदियों के  संरक्षण  के लिए अरबों रुपये  बहाये  जा चुके हैं और  इनके संरक्षण के नाम पर  धन का बहाया जाना  अब भी ज़ारी है।  केन्द्रीय  प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड , केन्द्रीय  जल आयोग , केंद्र  सरकार  का पर्यावरण  एवं वन  मंत्रालय , नमामि -गंगे  प्राधिकरण  आदि  सरकारी  खानापूर्ति  के रूप में कार्यरत हैं।  भारत सरकार  2002  में राष्ट्रीय  जल नीति  की घोषणा कर चुकी  है वहीँ  पर्यावरण संरक्षण  एक्ट 1986  लागू है।  न्यायालय  का दख़ल  इन नदियों  के  दिनोंदिन होते   बदतर   हालात  पर  सामने आता रहता है। गंगा  बचाओ  आंदोलन , यमुना बचाओ  आंदोलन  भी  अपनी-अपनी रफ़्तार  से  चलते  आ रहे हैं।  राजनीति  चुनावों  के मौसम  में इन नदियों  की सबसे  बड़ी  हितैषी  बनकर  उभरती है  और  नदियों  के प्रति  आस्था  और विश्वासों  से जुड़े  भावनात्मक   मुद्दों  को   बड़ी चतुराई  से जनता के बीच  पेश करती है, तब ऐसा लगता  है कि  अगले ही क्षण  सब कुछ जादुई  ढंग  से बदल जाने वाला है।  देश  की जनता को जागरूक  होकर  जीवनदायिनी  नदियों के प्रति  अपने कर्तव्यों  का पालन  करना होगा  तभी सार्थक परिणामों की उम्मीद फलीभूत होगी।

दुनिया में  पहली बार  न्यूज़ीलैंड की एक नदी Whanganui को  जीवित  व्यक्ति के कानूनी हक़  देने का समाचार सितंबर  2012  में आया था।  भारत  में  सनातनी श्रद्धालुओं ( हिंदुओं) की आस्था  से जुड़ीं  नदियों को  जीवित व्यक्ति के अधिकार  दिलाने  वाले  मियाँ  मोहम्मद  सलीम के प्रयासों की  सराहना  होनी चाहिए  जिन्होंने  गंगा -जमुनी  तहज़ीब का अनूठा  उदाहरण  पेश किया  है  जबकि  भारत में हिन्दू-मुस्लिम एकता  की जड़ें  खोदने के राजनैतिक  प्रयास अपने चरम  पर हैं।  
                                                                                    - रवीन्द्र सिंह यादव