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बुधवार, 12 अप्रैल 2017

नंगे होकर अपनी शर्म नीलाम न करो किसान भाइयो.........

प्रधानमंत्री  धनाड्यों से मिलते हैं ग़रीब  किसानों  से नहीं !

सोमवार  10  अप्रैल 2017  का दिन  प्रधानमन्त्री कार्यालय ( जिसे अब लोक कल्याण मार्ग नाम दिया गया है )  के  निकट  गवाह बना  तमिलनाडु के कावेरी बेसिन  से  आये  किसानों के नंगे  होकर  दौड़ने और  सड़क पर लोटने  के  असहज दृश्य का।   पिछली  14  मार्च  2017   से   अपनी मांगों को लेकर आंदोलनरत  किसान  अपना  आपा  खोकर प्रधानमन्त्री  कार्यालय  के बाहर   निर्वस्त्र हो गए।   दिल्ली  पुलिस के  डीसीपी द्वारा  किसानों को  प्रधानमंत्री से मिलने का आश्वासन देकर  प्रधानमंत्री कार्यालय  ले जाया गया  जहां  किसानों से   एक अधिकारी को अपनी  ज्ञापन/ पेटिशन देकर  चले जाने को कहा गया। समाचारों के अनुसार  बाहर  आकर  क्षुब्ध  और आक्रोशित  किसानों  ने  वस्त्रहीन होकर  प्रधानमंत्री  कार्यालय के  निकट दौड़ लगायी  और सड़क पर लोटे। बाद में पुलिस द्वारा इन किसानों को गिरफ्तार कर लिया गया। 
किसानों का कहना है कि  कवेरी डेल्टा क्षेत्र में पानी की कमी  की विकट   समस्या के चलते पिछले साल  से अब तक 29 लाख हेक्टेयर से ज्यादा कृषि योग्य  भूमि में किसी भी प्रकार की  फसल को  नहीं उपजाया जा सका है। 

यह दृश्य निर्मम ,पक्षपाती ,जन - उद्देश्यहीन , मीडिया  के लिए एक सनसनीखेज़  ख़बर  से अधिक कुछ नहीं  बन सका।  सड़क पर बदहवास दौड़ते  और लोटते  किसान अपनी बेशर्मी  नहीं दिखा रहे  बल्कि वे तो  फ़ेसबुक ,ट्विटर ,गूगल , बिकाऊ  मीडिया  के ज़रिये मनचीता समाचार , चित्र  और देश में बहार ही बहार  है  का राग अलापने  वाली  मोटी  चमड़ी वाली , बेरहम  सरकार  को नंगा करना चाहते  होंगे।  और साथ में सन्देश भी देना चाहते  होंगे कि  अब गाँधीवादी  तौर -तरीकों का  इस सरकार  की नज़र  में कोई औचित्य नहीं बचा है। 

विपक्ष ने भी  इस आंदोलन  के दौरान  केवल  खानापूर्ति  जैसा व्यवहार  किया।  बैंकों  के क़र्ज़, साहूकार के क़र्ज़ , फसल की बर्बादी , सिंचाई के साधनों का अभाव ,सूखा ,भूख  और बेकारी आदि के चलते  राज्य में हुई किसानों की मौतों को मुद्दा बनाते  हुए  अपने मृत साथियों की  खोपड़ियाँ  गले में लटकाये  तमिलनाडु से दिल्ली पहुंचे ये किसान संवेदनहीन  सत्ता के गलियारों के  बीच  जंतर -मंतर  दिल्ली पर  अपनी मांगों  को लेकर आंदोलनरत हैं। 

तमिलनाडु में भूतपूर्व मुख्यमंत्री  जयललिता के निधन के बाद उत्पन्न राजनैतिक  संकट का भले ही  फ़ौरी  तौर  पर पटाक्षेप हो गया हो  लेकिन राज्य के किसानों की दुर्दशा की  अवहेलना  कर पाना अब  मुमकिन न होगा।  पिछले वर्ष  तमिलनाडु में चुनाव सम्पन्न हो चुके हैं इसलिए  केंद्र सरकार और राज्य सरकार को किसानों  की मांगों  और समस्याओं में कोई रूचि  नहीं है क्योंकि राजनैतिक स्वार्थ  का गणित  तो अब हिमाचल प्रदेश , उड़ीसा ,गुजरात ,कर्नाटक , म. प्र. , छत्तीसगढ़ , राजस्थान  पर टिक  गया क्योंकि  इन राज्यों में आने वाले समय में राजनैतिक दलों को चुनावों का सामना करना है।  ऐसा  देश पहली बार अनुभव कर रहा है जब  किसानों के क़र्ज़ माफ़ी  के मुद्दे को सीधे वोट  से जोड़ दिया गया। यह सौदेबाज़ी  घटिया  राजनीति  का जीवंत  उदाहरण  है। 2008  में  यूपीए-1  (पूर्व प्रधानमंत्री  डॉक्टर  मन मोहन  सिंह ) सरकार ने   देशभर के किसानों  का  लगभग 70  लाख  करोड़  क़र्ज़   माफ़ किया था। जिसका  राजनैतिक लाभ  मिला , सत्ता में 2009  में यूपीए-२ सरकार  के रूप में वापसी हुई  लेकिन किसान  अगले कुछ ही सालों में  पुनः  क़र्ज़  के दुष्चक्र  में फंसकर  आत्महत्या  करने लगे। उल्लेखनीय  है  पिछले 22  सालों में  लगभग  3 लाख  किसान  आत्महत्या  कर चुके हैं  जिनकी  अलग-अलग  वज़ह  हैं। 2008  में देशभर  में  हुई किसानों की   कर्ज़ -माफ़ी  से   किसानों की   आत्महत्याओं  में  कमी  तो  आयी  लेकिन  बंद  नहीं  हुईं।  2014   के  बाद  किसानों की आत्महत्या  का आंकड़ा  फिर बढ़ने  लगा.


उत्तर  प्रदेश में विधानसभा चुनावों के दौरान  वर्तमान प्रधानमंत्री द्वारा  वोटिंग  आरम्भ  होने के  चंद  दिनों पूर्व  ही  किसानों की क़र्ज़  माफ़ी  की घोषणा की थी जबकि कांग्रेस पार्टी का  किसानों की क़र्ज़ माफ़ी पर होम वर्क  लम्बे समय से तैयार था  जोकि  कांग्रेस -सपा  की अविश्वसनीय  जोड़ी से  चालाकी से छिन  गया। अब उत्तर प्रदेश में  1  लाख  तक के फसली  ऋण ( केवल राष्ट्रीयकृत  बैंकों  से लिए गए ) के माफ़  किये जाने की घोषणा कर  दी गयी है  जोकि  प्रसंशनीय  क़दम  है।  महाराष्ट्र  से भी किसानों के  क़र्ज़ की माफ़ी का मुद्दा  ज़ोर  पकड़ रहा है। पंजाब  में  भी  बैंक  ऋण  माफ़ी  की प्रक्रिया  शुरू  किये जाने  का दबाव  पंजाब सरकार  पर है। जो मांगेगा उसे दे देंगे  या सिर्फ अपनी  पार्टी  के शासित  राज्यों में ही क़र्ज़ माफ़ी  होगी इस पर अभी तक  केंद्र में सत्तारूढ़  दल   का स्पष्ट  दृटिकोण  सामने नहीं आ सका है।  वैसे भी अब तक  केंद्र सरकार  किसान विरोधी नीतियों  के लिए  बदनाम हो चुकी है  जिसके पास कोरे नारे भर हैं  कोई ठोस किसान-नीति  नहीं है। प्रधानमन्त्री द्वारा   किसी  एक प्रदेश  में ( जहां  चुनाव  हों )  किसानों  के  कर्ज़ - माफ़ी की  घोषणा  की  जाती  है तो यह देश के   अन्य  प्रदेशों  के किसानों के  साथ  धोखा  है।  

सत्ता की चौखट  को अब किसानों की आवाज़ सुननी  ही होगी  क्योंकि  देश की लगभग 65 %  से   अधिक आबादी  खेती -किसानी में  खपकर  अपना  जीवन -यापन  कर रही है जोकि  रोज़गार  का  अपरोक्ष  भरोसेमंद  स्वरुप है।  सरकार  बेरोज़गारी  को लेकर  परेशान  ज़रूर है लेकिन उसके प्रयास  वादों के मुताबिक़  परिणाम नहीं दे पाए।  किसानों की आय सन 2022  तक  दो गुना  करने का खोखला नारा  हम आजकल खूब ज़ोर  से सुन रहे हैं  लेकिन  बिना किसी योजना  या नीति  के ... ऐसा  नारा  देने वाले जनता  को महामूर्ख समझते हैं।  आज से ही  2019  में सत्ता  में अपनी वापसी  की घोषणा करने वाले पूरी बेशर्मी  के साथ  किसानों का मज़ाक  उड़ा  रहे हैं जबकि  जनता ने जनादेश मई  2019 तक  ही दिया है।  जनता  के सेवक जब जनता  का मसीहा  बनकर  अपना महिमामंडन  करवाने  लगें तो  लोकतंत्र  अपनी मर्यादा  के मूल्यों  से  रास्ता भटक जाता है।       

किसानों की  क़र्ज़ माफ़ी  का  विरोध  करते  केंद्रीय  वित्त मंत्री ,आरबीआई  गवर्नर  और भारतीय स्टेट  बैंक की प्रमुख  के बयान घोर  निंदनीय  हैं जोकि  सत्ता के केंद्रों और नौकरशाही  की कठोरता व  संवेदनहीनता  के  मील  के पत्थर बन चुके हैं। केंद्रीय  कृषि मंत्री  का बयान  कि  किसान  नपुंसकता  के कारण आत्महत्याएं  करते हैं  पिछले साल  खूब चर्चा  में रहा।  राजनैतिक दलों को चंदा  देने वाले धनकुबेरों  के प्रति  इनकी वफ़ादारी को क्यों न कठघरे  में खड़ा किया जाय..? पूँजी  के पुजारी  कराहती  मानवता  का दर्द  महसूस  नहीं कर पाते उन्हें  सिर्फ़  अपनी चिंता होती  है  जन  गण  मन  की नहीं। देश  की जीडीपी के चार मुख्य घटक हैं - कृषि ,सेवा -क्षेत्र ,उद्योग ,आयात एवं निर्यात।  जीडीपी में 1951  में कृषि क्षेत्र देश का योगदान  जहाँ 50 % था जो अब सरकारी उपेक्षा और बदलती  परिस्थितियों  के चलते 16 -17 % पर आ गया है।   इसीलिए सरकार के लिए कृषि क्षेत्र अब कोई दुधारू गाय नहीं रह गया है। 

ग़रीब  किसान   बैंक  या साहूकार से क़र्ज़  लेकर  खेत को   फसल के लिए तैयार  करता  है।  बैलों  को सालभर  दाना-चारा  खिलाने  और देखभाल के झंझट  से मुक्त  होने के फेर में किसान  अब ट्रैक्टर  से  खेत  जुतवाता  है  और जुताई  की रकम अदा  करता है।  फिर  बीज , खाद ( फर्टिलाइज़र),कीटनाशक ,कृषि -यंत्र , सिंचाई  के लिए  पानी , बिजली , डीज़ल , खेत  की बाड़ ( आवारा  और जंगली पशुओं से  फसल को बचाने  हेतु   कटीले  झाड़ आदि खेत  की  मेंड़  पर  चारों  ओर  लगाना ) आदि में पैसा ख़र्चते हैं। खेत में  बीज बोने  से लेकर फसल की कटाई तक किसान का पूरा परिवार  इसमें खपा रहता है।  फसल पकने पर  कटाई (थ्रेसर  या अन्य मशीनों द्वारा)से लेकर  अनाज को घर / बाज़ार  तक पहुंचाने  में   किसान  का लगातार  पैसा ख़र्च   होता  है।  बाज़ार  में सरकारी  ख़रीद   में फसल के  अयोग्य  हो जाने पर  औने -पौने  दाम  पर आढ़तिया  को बेचता है और एक  सादा   कागज़  की पर्ची  लेकर घर  लौटता  है।  आढ़तिया  कुछ हफ़्तों बाद  भुगतान करता है और तौल  में भी हेरफ़ेर  करता है।  भुगतान मिलने  पर  ब्याज सहित  क़र्ज़  का भुगतान  करता है ताकि क़र्ज़  लगातार  मिलता रहे।  बचे  हुए  धन से  अपने परिवार  का गुज़ारा करता है  मतलब  किसान  हर क़दम  पर ठगा  जाता है। परिवार  में किसी सदस्य  के बीमार होने , शिक्षा आदि का  अतिरिक्त  खर्च  आने ,पालतू पशु की मृत्यु  होने ,फसल  ख़राब  होने , सूखा-बाढ़  आदि प्राकृतिक  प्रकोप  आने ,किसी प्रकार  का निर्माण  करने ,परिवार में  कोई आयोजन  होने  आदि से  किसान  के घर  का बज़ट   बिगड़  जाता है।  इस दुष्चक्र  के चलते किसान  क़र्ज़  के चक्रव्यूह  में फंसे रहते हैं  और  बिषम  परिस्थितियों का सामना  करते -करते  टूट  जाते  हैं  और आत्महत्या  जैसे त्याज्य  क़दम  उठा लेते हैं।     

हर तरह की मार सहता  किसान  पूरी ईमानदारी के साथ  मेहनत  करता है  फिर भी बदहाल है। क़माल  की बात तो यह है कि  किसान को अपना माल  खपाने  वाले   आजकल खूब मज़े में हैं। वेतन  आयोग सरकारी नौकरी  वालों  के लिए जो सिफारिशें  सरकार  को सुझाता  है उन्हें सरकार  लागू करती है  लेकिन किसानों की बेहतरी  के लिए बने आयोगों की  सिफारिशें आज भी धूल  चाट रही हैं।  सरकार  केंद्रीय  कर्मचारियों  का न्यूनतम वेतन  18000  रुपये   और अधिकतम 2.5  लाख  रुपये प्रतिमाह   करने पर  सहमत  हो जाती है लेकिन  अभावों  में जीवन  गुज़र -बसर  करने वाले किसानों  की बात भी नहीं सुनना  चाहती।  समझदार  लोग फसल के  सरकारी समर्थन मूल्य और  सरकारी  तनख़्वाह  के अनुपात  की गणना  क्यों नहीं करते..... ?  एक उद्योगपति  अपने उत्पाद  की क़ीमत  ख़ुद  तय करता  है जबकि किसान  अपने उत्पाद की क़ीमत के लिए सरकारी  नीतियों का मोहताज़  है। इसी  वर्ष  जनवरी  में  टमाटर  से भरे  सैकड़ों ट्रक उचित  मूल्य न मिलने के कारण  सडकों  पर  खाली  किये  गए।ये  टमाटर वाहनों  द्वारा  सड़क पर पिचले  गए।   एक तरफ  किसान  का टमाटर  एक रुपये प्रति  किलो  भी  नहीं बिक  सका  था  वहीँ  दूसरी ओर   धनकुबेरों  की सब्ज़ी की आलीशान   दुकानों में   40  रुपये  प्रति  किलो  आसानी  से बिक रहा था।  ऐसा  इसलिए क्योंकि  देश में लूटतंत्र  हावी  है। 

किसानों की क़र्ज़ माफ़ी  की  स्थिति  बार -बार  पैदा न हो  इसके लिए  देश में किसान - नीति  का अस्तित्व में होना ज़रूरी  है।  कोरी  लफ़्फ़ाज़ी  किसान  की दुखती  रग  को छेड़ती  है  और उसके घावों पर नमक डालती है। आजकल भारतीय राजनीति  मसीहावाद   और लोकप्रियतावाद  के संक्रमण  से ग्रस्त  है  जोकि  भविष्य  की  अंधकारमय तस्वीर  का  एक धुंधला स्वरुप है।  आजकल हम समाचार पढ़ते हैं -" प्रधानमन्त्री  के दख़ल  से  फलां  बच्चे / बच्ची  का इलाज़  हो गया , फलां  सड़क  का नाम बदल गया , फलां  गाँव का नाम बदल गया, फलां को पासपोर्ट  मिल गया आदि-आदि "........   ये समाचार  आजकल मीडिया  में खूब  चटख़ारे  लेकर परोसे  जा रहे  हैं। न  ऐसे  समाचार  छपवाने वालों को  शर्म है न  छापने  वालों को।  किसी पीड़ित  का इलाज़  क्या अब  सत्ता  में शीर्ष पर बैठे  व्यक्ति  के दख़ल  से ही हो पायेगा ..?  ऐसी व्यवस्था सुनिश्चित क्यों नहीं की जाती कि  किसी अंतिम पायदान  पर खड़े पीड़ित को हर हाल में इलाज़ की सुबिधायें मुहैया  हो सकें ? मरीज़  अस्पतालों के गेट पर दम  तोड़ देते हैं  और व्यवस्था  निष्ठुर  होकर सोती रहती है।  लोग अपना  दिल और  दिमाग़   इस्तेमाल करें फिर   प्रधानमंत्री कार्यालय   के पास  निर्वस्त्र  हुए  किसानों  के  असहज व्यवहार  की निंदा करें। हालांकि  सार्वजनिक  स्थलों पर  वस्त्रहीन  हो जाना  क़ानूनी  अपराध  है। 

प्रधानमंत्री  से देश  का पूंजीपति , फिल्म - कलाकार, तथाकथित  देशभक्त व  समाजसेवक  बेरोकटोक  जब चाहे  मिल सकते  हैं लेकिन  ग़रीब  पीड़ित   किसान  नहीं  जोकि  अपना आंदोलन  पिछले  तीन सप्ताह से भी अधिक समय से  अहिंसक  तरीकों  से ज़ारी रखे  हुए  हैं।  गंभीर  शोचनीय  मुद्दा  है  कि  देश के निर्माण  में शांतिपूर्वक  अपना रचनात्मक  योगदान करने  वाला किसान सरकार की ऐसी उपेक्षा  का शिकार  क्यों है...?  भूमि -अधिग्रहण क़ानून  में संशोधनों  को लेकर  मात खा चुकी केंद्र सरकार किसानों  से इतनी नफ़रत  करती  है यह  तो  उसके व्यवहार  से अब स्पष्ट हो चला है।  

महसूस कीजिये  एक धमक  कि हम  कैसा  भारत  बना  रहे हैं।  भुखमरी  और बेकारी  से जूझते  भारत  को  विकास  के ऐसे रास्तों की तलाश  है जहां  सबको  समान  अवसर  मिलें।  देश  में  खाया  पिया  चंगा  और अघाया  एक वर्ग है  जो  येन केन प्रकारेण  राष्ट्रीय  संपत्ति  पर  पूर्णतः  आधिपत्य  जमाना  चाहता  है  जहां  ग़रीब  और ग़रीबी  की चर्चा  सिर्फ़  इसलिए होती है कि  इनका इस्तेमाल  अपने हित  साधने के लिए  कैसे किया जाय  इनकी भलाई  का चिंतन  इनके बीच  निषिद्ध  है  केवल बयान  देना  फैशनेबल  शग़ल  है।     
  @रवीन्द्र  सिंह  यादव